मधुमेह की बीमारी देश-दुनिया में बढ़ी समस्या मानी जा रही है। पहले इसे शहरी क्षेत्रों की बीमारी मानते थे तो अब ग्रामीण इलाकों में भी मरीजों की संख्या बढ़ रही है। इसके दो प्रमुख कारण माने जाते हैं- जेनेटिक और मोडिफाइबल फैक्टर। जेनेटिक फैक्टर बदला नहीं जा सकता। मोडिफाइबल फैक्टर का आशय है जीवनशैली व खानपान में बदलाव लाकर डायबिटीज से बचाव व राहत पाना।

क्या होते हैं मोडिफाइबल फैक्टर
डायबिटीज के दो प्रकार होते हैं - टाइप-1 और डायबिटीज टाइप-2, डायबिटीज टाइप-1 मुख्य रूप से जेनेटिक कारणों से होती है। जबकि सबसे ज्यादा होने वाली डायबिटीज टाइप-2 के पीछे अनियमित जीवनशैली व गलत खानपान मुख्य वजह है। डायबिटीज टाइप -2 को जीवनशैली व खानपान में बदलाव कर नियंत्रित किया जा सकता है। इसे ही मोडिफाइबल फैक्टर कहते हैं। इसमें तीन मुख्य आदतें हैं। जानते हैं इनके बारे में-
१- गलत खानपान
स्वस्थ व्यक्ति को अपने शरीर के प्रति किग्रा वजन के हिसाब से रोजाना 25-30 कैलोरी डाइट लेनी चाहिए। शहरी क्षेत्रों में रेडी टू ईट और फूड होम डिलीवरी के चलन से लोग अधिक खा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी खाने की गुणवत्ता और मात्रा बढ़ी है। फास्ट फूड में फैट के साथ शुगर होता है जो अधिक नुकसान करता है। पेट की चर्बी बढ़ाता है। चर्बी बर्न नहीं होने से मोटापा और फिर डायबिटीज होती। अल्कोहल व नशा आदि भी नुकसान पहुंचाते हैं।
२- तनाव (स्ट्रेस) लेना
स्टे्रस शरीर में चार तरह के स्टे्रस हार्मोन का स्तर बढ़ाता है। इसका पैंक्रियाज पर असर होता, इससे शुगर बढ़ती व डायबिटीज होती है।
३-मेहनत नहीं करना
पहले के लोग ज्यादा शारीरिक परिश्रम करते थे जिससे उनकी कैलोरी बर्न होती थी। लेकिन अब जीवनशैली ऐसी हो गई है कि शारीरिक मेहनत कम हो रही है। इसलिए शरीर में कैलोरी बर्न नहीं होती है और फैट (चर्बी) के रूप में जमा होती है। कमर के आसपास वाला विसरल फैट ज्यादा नुकसान करता है। फैट सेल्स के दुष्प्रभाव से मेटाबॉलिज्म यानी भोजन के ऊर्जा में बदलने की क्रिया गड़बड़ाती जिससे इंसुलिन के काम करने की क्षमता घटती है।
प्रमुख लक्षण
अधिक भूख एवं प्यास लगना। यूरिन बार-बार और ज्यादा आना। वजन में कमी, शरीर में खुजली, कमजोरी व थकान रहना, पिंडलियों में दर्द, बांएठा आना। बार-बार संक्रमण होना या देरी से घाव भरना। हाथ पैरों में झनझनाहट, सुन्नपन या जलन और नपुंसकता आदि। हालांकि यह जरूरी नहीं कि ये सारे लक्षण एक ही रोगी में पाए जाएं। कभी-कभी बिना किसी लक्षण के भी जांच होने पर इस बीमारी का पता चलता है। अगर बीमारी की जांच शुरुआती स्टेज में कराते हैं तो लक्षण कम ही दिखते हैं।
जल्दी पकने वाला आहार ही लें
जो आहार पकने में जितना समय लेता है वह उतनी ही देरी से पचता है। इस श्रेणी में नॉनवेज को रखा जाता है। हरी सब्जियां कम समय में पकती और जल्द पच जाती हैं। इसलिए जल्द पकने वाली चीजें खाने और खूब पानी पीने की सलाह दी जाती है। इससे ब्लड में शुगर लेवल नियंत्रित रहता है।
प्रॉपर मील लेने की आदत डालें
भोजन तय समय पर करना चाहिए। लोग इसकी बजाय कुछ भी खाते रहते हैं। इससे वे भोजन से कई गुना अधिक कैलोरी जंक फूड और कुकीज के रूप में ले लेते हैं।
रोजाना एक्सरसाइज करें
ग्लूकोज को शरीर के दूसरे अंगों तक पहुंचाने में व्यायाम मदद करता है। रोजाना 50 मिनट व्यायाम से वजन और 30 मिनट की एक्सरसाइज से डायबिटीज कंट्रोल होती है।
खानपान की खराब आदतें भी वजह
नाश्ते-लंच, डिनर में देरी से हार्मोन्स का बैलेंस बिगड़ता है। जंक-फास्ट फूड में लोग कॉम्बो ऑफर देखकर ऑर्डर करते और पूरा खाने की कोशिश करते हैं। यह अनहैल्दी फूड भी बीमार करता है।
डॉ. अनिल भंसाली, हार्मोन रोग विशेषज्ञ, विभागाध्यक्ष, एंडोक्राइन विभाग, पीजीआइ, चंडीगढ़
ऋतिका समंदर, जॉइंट सेक्रेटरी, इंडियन डायटेटिक एसोसिएशन दिल्ली चैप्टर