
Breastfeeding: बच्चे के जन्म के बाद मां का दूध सिर्फ भूख मिटाने का जरिया नहीं होता, बल्कि यह उसकी शुरुआती जिंदगी की सेहत की नींव तैयार करता है। इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) पहले छह महीने तक केवल मां का दूध पिलाने की सलाह देता है। हालांकि, भारत में एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग को लेकर स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। आइए जानते हैं कि मां के दूध से बच्चे को क्या-क्या मिलता है और भारत में ब्रेस्टफीडिंग की दरों में कितना बदलाव हुआ है और इसके पीछे क्या कारण हैं।
WHO के अनुसार, मां का दूध शिशु को आवश्यक पोषण देने के साथ-साथ संक्रमणों से भी सुरक्षा प्रदान करता है। इसमें मौजूद एंटीबॉडी, Secretory IgA, Human Milk Oligosaccharides (HMOs), Lactoferrin, ग्रोथ फैक्टर्स और आवश्यक फैटी एसिड बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में मदद करते हैं। साथ ही, ये आंतों में अच्छे बैक्टीरिया के विकास को बढ़ावा देते हैं और मस्तिष्क, आंखों तथा शरीर के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग का मतलब है कि बच्चे को जन्म के बाद पहले छह महीने तक केवल मां का दूध दिया जाए। इस दौरान पानी, शहद, घुट्टी या अन्य खाद्य पदार्थ देने की जरूरत नहीं होती। World Health Organization के अनुसार, जन्म के पहले घंटे में स्तनपान शुरू करना और छह महीने तक केवल मां का दूध देना बच्चे के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है।
National Institutes of Health (NIH) के अनुसार, मां के दूध में कई ऐसे पोषक और जैविक तत्व पाए जाते हैं, जो बच्चे के विकास और इम्यूनिटी को मजबूत करने में मदद करते हैं।
भारत में एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग को लेकर आंकड़ों में बदलाव देखने को मिला है। National Family Health Survey (NFHS-5, 2019-21) के अनुसार, भारत में 6 महीने से कम उम्र के बच्चों में एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग की दर 63.7% थी। वहीं, NFHS-6 (2023-24) के अनुसार यह दर 55.8% दर्ज की गई है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), International Breastfeeding Journal और भारत में किए गए कई अध्ययनों के अनुसार, इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं-
डिस्क्लेमर: यह लेख इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर लिखा गया है। लेख में दी गई जानकारी स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से है। यह डॉक्टर की सलाह, जांच या इलाज का विकल्प नहीं है।