
नोवेल कोरोना वायरस (Novel Corona Virus) के फैलने के बाद पूरी दुनिया में इस वायरस को लेकर खौफ का माहौल है। सरकारें डरी हुई हैं और लोग घरों से निकलने में भी कतरा रहे हैं। लोगों का ये डर बेबुनियाद नहीं है। करीब 200 दिनों में ही इस वायरस ने पूरी दुनिया में 10,421,615 लोगों को संक्रमित कर दिया है जबकि 508,421 लोगों की जान ले चुका है। भारत में भी कोरोना संक्रमितों का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर बढ़ता जा रहा है। रविवार को भी बीते 24 घंटे में देश में करीब 20 हजार से संक्रमितों के नए मामले सामने आए हैं। वहीं मरने वालों का आंकड़ा भी अब 17 हजार के करीब पहुंच गया है। यही वजह है कि इस वायरस से छुटकारा पाने के लिए पूरी दुनिया में 120 वैक्सीन पर शोधकार्य जारी है। अभी तक कोई भी देश सौ फीसदी कोरोना वैक्सीन नहीं खोज सका है। हालांकि अब अमरीका में वैज्ञानिकों (American Scientists) की एक टीम ने लैब में ही कृत्रिम एंटीबॉडी बनाई जो कोरोना रोगियों को बचाने में कारगर साबित हो सकता है।
कैसे बनाया कृत्रिम एंटीबॉडी
दरअसल वैज्ञानिकों को कोरोना संक्रमण से ठीक हो चुके रोगियों के प्लाज्मा (Plazma) का उपयोग कर संक्रमितों का इलाज कर रहे हैं। लेकिन कोरोनो के खिलाफ इम्यूनिटी विकसित कर चुके इन स्वस्थ कोरोना संक्रमितों से पर्याप्त मात्रा में प्लाज्मा नहीं मिल पा रहा था जिसके चलते अस्पतालों में इलाज करने में दिक्कत आ रही थी। ऐसे में वैज्ञानिकों ने लैब में ही कृत्रिम प्लाज्मा एंटीबॉडी बनाने की ठानी। इसी शोध में वैज्ञानिक शुरुआती परीक्षणों में सफल रहे और उन्होंने कोरोना से लडऩे वाला एक कृत्रिम रूप से तैयार मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (Monoclonal Antibody) बनाया है जो संभवत: कोरोना संक्रमितों के लिए रामबाण बन सकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि वे अगस्त से इस एंटीबॉडी का इंसानो पर परीक्षण शुरू कर देंगे। अगर परीक्षण सफल रहा तो सितंबर से इसका व्यापक प्रयोग किए जाने की संभावना है।
दावा-रामबाण साबित होगी थैरेपी
लैब में इस कृत्रिम प्लाज्मा एंटीबॉडी को विकसित करने वाले अमरीकी वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित अमरीका में यह थैरेपी रामबाण साबित हो सकती है। वैज्ञानिकों का दावा है कि थैरेपी कोरोना वायरस का खत्मा करने में सक्षम है, साथ ही लंबे समय तक वायरस के शरीर और प्रतिरक्षा तंत्र पर पडऩे वाले दुष्प्रभावों से भी बचाती है। अमरीकी दवा संगठनों का भी मानना है कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में इसकी गजब की क्षमता ने अगस्त में इंसानी परीक्षणों के लिए काफी उम्मीद जगाई है।
क्या होता है एंटीबॉडी
दरअसल एंटीबॉडी किसी भी वायरस के संक्रमण से लडऩे के लिए शरीर में स्वयं उत्पन्न होने वाला प्रोटीन होता है। एक 'संभावित न्यूट्रलाइजिंग' एंटीबॉडी एक रोगजऩक़ वायरस के प्रसार को रोकने में सक्षम है। नोवेल कोरोना वायरस कोविड-19 एंटीबॉडी वायरस का टीका नहीं हैं। ये ब्लड पैकेट्स (Blood Packets) कोरोनोवायरस रोगियों से एकत्र किए जाते हैं। शोध के अनुसार एक बार जब कोई व्यक्ति वायरस से ठीक हो जाता है तो संभावनाएं होती हैं कि उनके रक्त में एंटीबॉडी होते हैं जो वायरस के खिलाफ लड़ सकते हैं जिससे रोगी वायरस के संक्रमण से काफी हद तक सुरक्षित हो जाता है।
जबकि मोनोक्लोनल एंटीबॉडी वायरस से लडऩे वाली एक जैसी प्रतिरक्षा कोशिकाओं से लैब में तैयार हुआ कृत्रिम एंटीबॉडी है। ये संक्रमित कोशिकाओं से सीधे लड़ता है और वायरस के संक्रमण को आगे बढऩे से रोक देता हैं। यह एंटीबॉडी थैरेपी दो से तीन माह तक संक्रमण से बचा सकती है। इससे वायरस से सीधे संपर्क में आने वाले फ्रंटलाइन डॉक्टर्स और अन्य चिकित्साकर्मियों को संक्रमण के जोखिम से बचाया जा सकता है।