
ऐसे में मरीज को बचाना मुश्किल हो जाता है। केवल 15त्न मामले ही पहले या दूसरे स्टेज में आते हैं। कई बार तो मरीजों में परेशानी लंबे समय से रहती है लेकिन वे इसकी अनदेखी करते रहते हैं जोकि बाद में गंभीर समस्या बन जाती है।
पेट के कैंसर के प्रकार
कोलन एवं रेक्टम, आंतों, लिवर, इसोफेगस (खाने की नली), अग्नाशय तथा पित्त की थैली का कैंसर। आंकड़ों की बात करें तो कैंसर से होने वाली 10 मौतों में 6 पेट से जुड़े कैंसर के कारण होती है।
कब डॉक्टर को दिखाएं
आंतों के कार्य में बदलाव यानी कभी कब्ज तो कभी दस्त, मुंह में छाले, दिन में पेट फूलना, अकारण वजन घटना, भूख ना लगना, थकान व पेट में दर्द, एसिडिटी, दस्त में खून या काला दस्त आना। ऐसी परेशानी 2-3 सप्ताह से है तो अपने डॉक्टर को तत्काल दिखाएं।
पहचान में देरी से इलाज मुश्किल
चौथे स्टेज में न केवल इलाज लंबा चलता है बल्कि, खर्च अधिक आता, बीमारी के दोबारा होने की आशंका रहती है। इलाज में एक साथ कई पद्धति की जरूरत पड़ती है। कैंसर की पहचान पहले-दूसरे स्टेज में होने पर कम खर्च में कारगर इलाज संभव है।
प्रमुख कारण
तम्बाकू-शराब की आदत प्रमुख कारण है। आनुवांशिक कारणों के साथ जो लोग फाइबर डाइट कम लेते हैं उनमें भी इस तरह की समस्या देखने को मिलती है।
जांचें और इलाज
कैंसर कौनसी स्टेज का है, उस आधार पर जांचें की जाती हैं। इनमें जीआई एंडोस्कोपी, बायोप्सी, एंडो-अल्ट्रासाउंड, एक्सरे,सीटी, पीईटी, एमआरआइ स्कैन आदि। इलाज में सर्जरी, कीमोथैरेपी, इम्युनोथैरेपी या टार्गेटेड थैरेपी की जाती हैं।