
खुद को काबिल बनाएं, संघर्ष देखकर रास्ता न बदलें
दिव्या खोसला कुमार
संडे वुमन गेस्ट एडिटर
मुंबई. प्रतिस्पर्धा के दौर में युवा तनाव के तले दबे जा रहे हैं। तनाव से खुद को बचाने व दूसरों की मदद का माध्यम हमें ही बनना होगा। मैं ऐसे परिवार से हूं, जिसका कोई भी सदस्य इस इंडस्ट्री से नहीं है। मैंने मुंबई आकर फिल्मी करियर की शुरुआत की। जब भी असफलता मिली, हर बार मां ने प्रेरित किया। मेरा मानना है कि हमें अपने जीवन में आने वाले संघर्षों को देखकर रास्ता नहीं छोडऩा चाहिए। बल्कि उनसे डटकर सामना करना चाहिए। भाग दौड़ से भरे जीवन में यह जरूरी है कि हम खुद से एक जुड़ाव महसूस करें। यह आम सी बात हो गई है कि युवाओं को भी स्ट्रेस और डिप्रेशन का सामना करना पड़ रहा है। इन सबसे बचने का तरीका है कि हम ऐसी परिस्थिति में मन और भावनाओं को शांत रखें। चुनौतियां जीवन का हिस्सा हैं: चुनौतियां जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन हमें मजबूत होकर और कड़ी मेहनत से इन सब चुनौतियों से लडऩा है और खुद को बेहतर साबित करना है। कोई भी परेशानी हो आप हमेशा बेस्ट करें।
कोविड-19 लॉकडाउन और उसके बाद बढ़ा है लोगों में डिप्रेशन
शशांक श्रीवास्तव @ भोपाल. तनाव को किसी कठिन परिस्थिति के कारण होने वाली चिंता की के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। जो की एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया है जो हमें अपने जीवन में चुनौतियों और खतरों से निपटने के लिए प्रेरित करती है। प्रत्येक व्यक्ति कुछ हद तक तनाव का अनुभव करता है लेकिन इसका स्तर बढ़ जाने पर हालात मानसिक तनाव का रूप ले लेता है।
मानसिक तनाव आज हमारे देश ही नही बल्कि पूरी दुनिया में एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। कोविड-19 के लॉकडाउन और उसके बादके आंकड़े और डराने वाले है। अभी हाल ही में इस ओर ध्यान देते हुए सरकार ने टेली मानस सर्विस की शुरुआत की है जिसके जरिए वो मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों तक मदद पहुंचाने का काम कर रही है। कुछ ऐसा ही काम हमारे शहर की सिमरन पारदसानी भी कर रही है। ,
अपनी लाइफ में एक पर्पस जरुर रखे : सिमरन पारदसानी
जिनके पास जीने के लिए 'क्यों' है, वे लगभग किसी भी 'कैसे' को सहन कर सकते हैं, विक्टर ई. फ्रेंकल के इस कोट से अपनी बात शुरू करते हुए सिमरन पारदसानी कहती है की अपनी लाइफ में हर किसी को एक पर्पस रखना चाहिए क्योंकि जिनके पास परपस होता है वो हर बुरे दौर से निकल आते है। कभी खुद क्लिनिकल डिप्रेशन के फेज से गुजरने वाली सिमरन आज दूसरों में मानसिक तनाव के लक्षण को पहचान कर उन्हें नई जिंदगी देने का काम कर रही है। वो बताती है कि 17 साल के उम्र में अपने पढ़ाई को लेकर मैं बहुत ज्यादा तनाव में थी। उस वक्त मेरे दोस्त भी नहीं थे जिनसे मैं अपनी फीलिंग्स शेयर कर पाती।
मेरा आत्मविश्वास खत्म सा हो गया था। फ्यूचर का कुछ सोच नही पाती थी। हर चीज अपने अगेंस्ट जाते देख मुझे बहुत गुस्सा आता था। तब मेरी मां रंजना, जो खुद एक साइकोलॉजीस्ट है, उन्होंने मेरे अंदर हो रहे बदलाव को महसूस किया और लगातार मुझसे बात करती रही। वो मुझे स्पेशलिस्ट डॉक्टर के पास ले गई जहां क्लिनिकल डिप्रेशन डायगोनोस्ट हुआ । फिर मैंने एक साल पढ़ाई ड्राप की और उस दौरान मैंने अपना पूरा ध्यान आर्ट और राइटिंग को निखारने पर लगाया। उस साल मैंने 12वी की परीक्षा न देकर अपने पसंद का हर वो काम किया जो मुझे अच्छा लगता था। मेरी मां हर वक्त मेरा साथ देती रही। अब मुझे ठीक हुए कई साल हो चुके है और इस दौरान मैंने कई किताबें पढ़ी और लिखी भी है। मैंने हर तरीके के डिप्रेशन के बारे में पढ़ा और जाना है। अब मैं लोगों में डिप्रेशन के लक्षण देखकर उनकी मदद करती हूं जिससे मुझे बहुत खुशी मिलती है।
कोरोना में लड़खड़ाए कदम, खुद को संभाला, तो विदेश में बने शिष्य
जबलपुर की समिधा मिश्रेकर ने मुश्किल समय में योग के जरिए खुद को संभाला
सोच- सेल्फ मोटिवेशन से जीती जा सकती है हर मुश्किल
नेहा सेन @ जबलपुर. कोरोना काल का दौर सभी के लिए परेशानी भरा रहा है। इस दौर में जहां लोगाें ने रोजगार खोए हैं, वहीं घर परिवार के सदस्यों को भी खोया है। इस बीच परेशानियों का दौर मैंने भी मानसिक तनाव के बीच झेला है, लेकिन जीवन में मैंने सीखा है कि सेल्फ मोटिवेशन से हर मु श्किल को पार किया जा सकता है। यह कहना है कि जबलपुर की समिधा मिश्रेकर का। समिधा ने ना सिर्फ कोविड की परेशानियों के बीच खुद को मानसिक तनाव से उबारा है, ब ल्कि लोगों को योग और मेडिटेशन से स्वस्थ्य रहने का रहस्य भी समझाया है।
बंद हो गए रेस्टोरेंट, हॉस्टल
समिधा ने बताया कि बात कोविड के पहले की है, जब जीवन में सब अच्छा चल रहा था। परिवार का रेस्टोरेंट और हॉस्टल अर्निंग का मुख्य जरिया था। लॉकडाउन लगते ही जीवन परेशानियों से घिर गया। अर्निंग सोर्स बंद हो जाने के कारण मैं डिप्रेशन में चली गई। परिवार में सभी के मायूस चेहरे सामने होते थे और बस एक ही चिंता थी कि आ खिर क्या होगा।
खुद से लगाव खत्म हो गया था
समिधा ने बताया कि वे शादी के पहले से लोगों को योग सिखा रहीं हैं। लेकिन खुद को डिप्रेशन से उबार पाने में काफी मु श्किल आई। उस वक्त हसबैंड संजय मिश्रेकर और खास मित्र नीलिमा देशपाण्डे ने ने भावनात्मक सहारा दिया। ध्यान, योग का असर हुआ और जीवन सामान्य हुआ। कोविड के समय ऑनलाइन योग क्लास लेना शुरू की, जो अलग-अलग शहरों के साथ-साथ विदेश तक बढ़ने लगी।
लंदन और अमरीका में क्लास
समिधा अब देश के वि भिन्न शहरों के साथ-साथ लंदन, अमरीका और साउथ अफ्रीका में भी ऑनलाइन कक्षाएं लेती हैं। इसके साथ मप्र विमन एंटप्रिन्योर एसोसिएशन से जुड़कर काम कर रहीं हैं। वे शहर आने वाले विदेशी मेहमानों को भी योग सिखाती हैं। वे कहती हैं हर किसी के जीवन में मु श्किलें हैं। हम दूसरों को खुद रहने के तरीके बताते हैं, लेकिन स्वयं इस पर अमल नहीं करते। मु श्किल समय के लिए स्वयं लड़ना पड़ता है।
डिप्रेशन को पीछे धकेल जीती जिंदगी की जंग
निशांत तिवारी.
बिलासपुर. अलका पांडेय को 40 वर्ष की उम्र में कैंसर का पता चला तो इस खबर ने उन्हें डिप्रेशन में धकेल दिया। क्योंकि पति के बाद वही अपने 14 साल के बच्चे की परवरिश कर रही हैं। उन्हें दिन रात इस बात की फिक्र लगी रहती थी कि उनके जाने के बाद उनके बच्चे की देखभाल कौन करेगा, लेकिन उन्होंने हौसला नहीं हारा, वह इस बीमारी से लड़ीं और आज खुशहाल जीवन जी रही हैं। अलका का कहना है कि जीवन में जरूरी है कि आपको सामने जो भी चुनौती आए आप उसका डटकर सामना करें। बिना लड़े घुटने टेकने से किस्मत भी साथ नहीं देगी। जब मुझे चौथी अवस्था के कैंसर का पता चला तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई थी, लेकिन मैं जीना चाहती थी। परिवार के साथ और बेटे की हिम्मत ने मेरे अंदर जिजीविषा पैदा की।