
हीमोफीलिया का कोई कारगर इलाज नहीं है, हालांकि इसका बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है। इससे रोगी सामान्य जीवन जी सकते हैं। रोगी को उपयुक्त उपचार देने का एक तरीका प्रोफाइलेक्सिस है। इसके माध्यम से क्लॉटिंग फैक्टर नियमित रूस से बदले जाते हैं। ये रक्तस्त्राव रोकते हैं।
छोटे बच्चों को साइकिल चलाते या बाहर खेलते हुए चोट लगना कोई नई बात नहीं है, लेकिन हीमोफीलिया से पीडि़त बच्चों के लिए ये स्थिति जान जोखिम में डालने जैसी हो सकती है। इस डर से इन बच्चों को ऐसी गतिविधियों से दूर रखना माता-पिता को परेशान करती है। हीमोफीलिया से पीडि़त बच्चों के अभिभावकों की कोशिश होती है कि बच्चा घर के अंदर ही रहे। हीमोफीलिया आनुवांशिक जेनेटिक रक्त रोगों में से एक है। ये खून के थक्के बनने की प्रक्रिया को धीमा करती है। इससे अत्यधिक रक्तस्त्राव हो सकता है और जोड़ों की क्षति से विकलांगता आ सकती है। यह रोग लडक़ों में अधिक पाया जाता है। इसके लक्षण उम्र बढऩे के साथ दिखने शुरू हो जाते हैं। हीमोफीलिया में पर्याप्त क्लॉटिंग फैक्टर नहीं बनता जो प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला प्रोटीन है। ये रक्तस्त्राव को नियंत्रित करता है। परिणामस्वरूप छोटी सी चोट से भी अत्यधिक रक्तस्त्राव, विशेष रूप से जोड़ों में हो सकता है। इससे जोड़ क्षतिग्रस्त व लगातार रक्तस्त्राव हो सकता है। हीमोफीलिया दो प्रकार के होते हैं। ए व बी। हीमोफीलिया ए प्रोटीन फैक्टर आठ की कमी से जबकि बी फैक्टर नौ प्रोटीन की कमी से होता है। चोट लगने पर पीडि़त की प्रतिरोधकता क्षमता को दवा से बढ़ाया जाता है।
क्या है प्रोफाइलेक्सिस
प्रोफाइलेक्सिस दो प्रकार का होता है। इंटरमिटेंट प्रोफाइलेक्सिस, जिसे कम अवधि के लिए सर्जरी से पहले या बाद में किया जाता है। कंटीन्युअस प्रोफाइलेक्सिस का प्रयोग लम्बी अवधि के लिए किया जाता है। कंटीन्युअस प्रोफाइलेक्सिस तीन तरह की होती है। प्राइमरी, सैकेंडरी व टेरिटियरी प्रोफाइलेक्सिस। ये जोड़ के रोग की शुरुआत के बाद संभावित नुकसान को रोकने के लिए प्रयोग होती है।