
कोरोना संकट ने मुश्किले बढ़ाई हैं लेकिन इसके कुछ सकारात्मक पहलू भी है जैसे प्रदूषण घटा है। लोगों को बातें करने का समय मिला है। लेकिन एक सवाल भी सामने आ रहा है कि क्या हमें वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के बारे में नहीं सोचना चाहिए? होम्योपैथी की बात करें तो यह वैज्ञानिक, तार्किक, सहज व सरल पद्धति है। यह संयोग मात्र है कि लॉकडाउन के बीच होम्योपैथी के आविष्कार डॉ. हैनीमैन की जयंती भी है। बीमारी पर होम्योपैथी का नजरिया दूसरी पैथियों से अलग है। हर जीव जैसे इंसान, विशाल या सूक्ष्म जीवों को जीवित रहने के लिए भोजन और अनूकूल वातारण चाहिए। जैसा चीनी के दानों के पास चीटियां आती हैं। अगर हम चीटियोंं को मारते भी हैं तो वे आती रहती हैं। जब चीनी को हटाते हैं तो चीटियां नहीं आती हैं। इससे स्पष्ट है कि बैक्टीरिया-वायरस को पनपने के लिए मनुष्य के शरीर में अनुकूल वातावरण-भोजन नहीं मिलेगा तो नहीं पनपेंगे। होम्योपैथी में शरीर-मन-भावना को इकाई माना गया है। इनमें जब असंतुलन होता है तो ही बीमारी होती है। होम्योपैथी और कोरोना को लेकर अच्छी खबरें आ रही हैं। इस पर विशेष अध्ययन होना चाहिए। अभी एक जरूरत यह भी है कि वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों को लेकर मंथन किया जाए। राजस्थान में इसी वर्ष दो होम्योपैथी मेडिकल कॉलेज खोलने की अच्छी पहल हुई है। हैल्थ वर्कर कैसे होम्योपैथी दवाओं के प्रसार में मदद करें इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है। झुंझुनूं इसका सफल उदाहरण है। इसलिए होम्योपैथी का प्रसार जरूरी है।
प्रदीप कुमार बोरड़ आइएएस
लेखक, आयुक्तकॉलेज शिक्षा, राजस्थान हैं। झुंझुनूं में डीएम रहते हुए होम्योपैथी का सफल प्रयोग किया था जो अब राज्य आयुष विभाग की योजना का हिस्सा बना।