
Tongue Cancer Risk Factors: अगर आपकी जीभ पर कोई घाव 2-3 हफ्तों से ठीक नहीं हो रहा, खाना खाते समय दर्द होता है या बोलने में परेशानी महसूस होती है, तो इसे सिर्फ मुंह का छाला समझकर नजरअंदाज न करें। हर ऐसा लक्षण कैंसर नहीं होता, लेकिन कुछ मामलों में ये Tongue Cancer (जीभ का कैंसर) के शुरुआती संकेत भी हो सकते हैं।
American Cancer Society के अनुसार, जीभ का कैंसर (Tongue Cancer) एक प्रकार का Oral Cancer (मुंह का कैंसर) है। इसका मतलब यह नहीं कि हर व्यक्ति को इसका खतरा समान होता है। कुछ लोगों में इसकी संभावना दूसरों की तुलना में अधिक हो सकती है। आइए जानते हैं वे प्रमुख जोखिम जिनका जिक्र विशेषज्ञ करते हैं।
American Cancer Society के अनुसार, सिगरेट, बीड़ी, सिगार, हुक्का या चबाने वाला तंबाकू (गुटखा, खैनी आदि) Tongue Cancer के सबसे बड़े जोखिम कारकों में शामिल हैं। लंबे समय तक तंबाकू का सेवन मुंह की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है और कैंसर का खतरा बढ़ा सकता है।
सिर्फ तंबाकू ही नहीं, बल्कि नियमित और अधिक मात्रा में शराब का सेवन भी जोखिम बढ़ाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, जब तंबाकू और शराब दोनों का सेवन साथ में किया जाता है, तो खतरा और अधिक बढ़ सकता है।
Mayo Clinic और American Cancer Society के अनुसार, कुछ मामलों में Human Papillomavirus (HPV) संक्रमण भी मुंह और गले के कुछ प्रकार के कैंसर से जुड़ा हो सकता है। हालांकि सभी Tongue Cancer के मामले HPV के कारण नहीं होते।
Cleveland Clinic के अनुसार, Tongue Cancer का खतरा उम्र बढ़ने के साथ बढ़ सकता है और यह पुरुषों में महिलाओं की तुलना में अधिक देखा जाता है। हालांकि आजकल कम उम्र के लोगों में भी इसके मामले सामने आ रहे हैं, इसलिए केवल उम्र के आधार पर लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
विशेषज्ञ बताते हैं कि लंबे समय तक खराब ओरल हाइजीन, मुंह में लगातार जलन या दांतों की समस्या कुछ मामलों में जोखिम बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हो सकती है। हालांकि इनके अकेले होने से कैंसर होना तय नहीं होता।
अगर ये समस्याएं 2-3 हफ्तों से ज्यादा समय तक बनी रहें, तो डॉक्टर से सलाह लें-
इन लक्षणों के कई अन्य कारण भी हो सकते हैं, इसलिए केवल लक्षण देखकर कैंसर मान लेना सही नहीं है। लेकिन लगातार बने रहने पर जांच कराना जरूरी है।
डिस्क्लेमरः इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह क्वालीफाइड मेडिकल ऑपिनियन का विकल्प है। लेकिन पाठकों को सलाह दी जाती है कि वह कोई भी दवा, उपचार या नुस्खे को अपनी मर्जी से ना आजमाएं बल्कि इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें।