
अक्सर महिलाओं को पुरुषों की तरह बैठने पर टोक दिया जाता है। लेकिन टेक्सास निवासी ऑर्थोपेडिक सर्जन बारबरा बर्गिन का कहना है कि पुरुषों की तरह बैठने से महिलाओं का स्वास्थ्य स्तर सुधरता है। महिलाओं को पुरुषों की तरह बैठने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए बाकायदा अमरीकी शहरों में हैशटैग सिट लाइक ए मैन (स्लैम OR #Sit Like A Man - SLAM) मुहिम भी चलाई जा रही है। इसकी शुरुआत तब हुई जब महिला डॉक्टरों को देर तक एक जैसी सधी हुई मुद्रा में बैठने के कारण कूल्हों की हड्डियों में दर्द रहने लगा। 65 साल की बर्गिन बताती हैं कि उन्हें 2010 में बरसाइटिस के लक्षण महसूस हुए। यह जोड़ों में होने वाला दर्द है जो नरम ऊतकों और हड्डियों के बीच सूजन के कारण होता है। बर्गिन का अनुमान है कि छोटी कार चलाने के कारण उनके कूल्हे की हड्डी में दर्द हुआ होगा।
मानव विकास के क्रम अनुसार, महिलाओं में कमर से नीचे जहां से जांघों की हड्डी शुरू होती है वह पुरुषों से ज्यादा व्यापक होती है। यानी महिलाओं में फीमर या जांघ की हड्डी, कूल्हे के साथ संयुक्त रूप में एक साथ मुड़ती और घूमती है। जिसके चलते महिलाओं को मिसलिग्न्मेंट से घुटनों या कूल्हों में दर्द हो सकता है। इसका प्रमुख कारण घुटने पर ज्यादा जोर देकर बैठना है। इसके लिए बर्गिन ने अपने मरीजों को सलाह दी कि वे पुरुषों की तरह दोनों घुटनों को सटाकर बैठने की बजाय उन्हें क्रास कर के बैठना शुरू करें।
1300 साल पुराना इतिहास
कॉरपोरेट प्रोटोकॉल विशेषज्ञ मायका मीयर का कहना है कि महिलाओं को एक खास पोश्चर में बैठने, चलने और खाने के ये नियम आज के नहीं 1300 साल पुराने हैं। यह एक सामाजिक अपेक्षा है जो सदियों से महिलाओं की सेहत बिगाड़ती आ रही है। महिलाओं को कैसे बैठना चाहिए इसका सबसे पहला ऐतिहासिक उल्लेख उस दौर में शिष्टाचार नियमावली के अनुसार हुआ करता था। दरअसाल, उस दौर में महिलाओं को अपने कौमार्य का संकेत देने के लिए घुटनों को एक साथ रखने के लिए प्रशिक्षित किया गया था। यह प्रथा जॉर्ज युग में मंद पड़ गई लेकिन विक्टोरियन युग (Victorian Age) तक इसका अस्तित्व था। समाज ने पांवों को क्रॉस कर बैठने वाली महिलाओं को सामाजिक उपेक्षा से देखा जिसका परिणाम चरित्रहीनता और कुछ मौकों पर समाज से बेदखल करना भी था। इसलिए घुटने चिपकाकर बैठने की प्रथा मजबूत हो गई।
पाँव की पोजीशन हो 11 व 01 बजे की तरह
पुरुषों की तरह बैठने के कई फायदे हैं। पुरुष आमतौर पर अलग-अलग मुद्राओं में बैठते हैं। बैठते समय उनके दोनों घुटनों पर एक समान दबाव पड़ता है। वे एक बार बाहर निकाल कर जांघ की हड्डी को आराम देते हैं। जब भी खड़े हों तो अपने घुटनों को बाहर की ओर रखें। इससे जोड़ों पर दबाव नहीं पड़ेगा। आपके पांवों की पोजिशन घड़ी के 11 और 01 बजे की तरह होनी चाहिए। बर्गिन महिलाओं को हील न पहनने की सलाह भी देती हैं क्योंकि यह भी जोड़ों और एड़ी के दर्द का एक बड़ा कारण है। ऐडी के दर्द से परेशान १०० लोगों में से ९५ महिलाएं ही होती हैं। बर्गिन जेंडर-न्यूट्रल प्रैक्टिस को व्यवहार में लाने पर जोर देती हैं।