
दुनिया भर में कोरोना वैक्सीन के 120 से ज़्यादा वैक्सीन पर काम चल रहा है लेकिन अभी तक कोई भी कारगर टीका सामने नहीं आ सका है। हालांकि इस बीच 10 टीकों को मानव परीक्षणों के लिए अगले चरण की मंज़ूरी मिल गयी है। हालांकि विश्व स्वास्थय संगठन सहित दुनिया भर के देशों के चिकित्सा विशेषज्ञों ने यह चेतावनी दी है कि वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया कितनी भी तेज़ क्यों न कर ली जाए लेकिन कोरोना वैक्सीन का टीका आमजन के उपयोग के लिए आने में काम से साल भर का समय लग सकता है। गौरतलब है की रविवार तक पूरी दुनिया में कोरोना वायरस से संक्रमितों की संख्या 69 लाख और इससे संक्रमित हो मरने वालों की संख्या 4 लाख का आंकड़ा पार कर गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन के हेल्थ इमरजेंसी के डायरेक्टर माइकल रेयान ने कहा है, की अब हमें "कोरोना वायरस के साथ रहने की ही आदत डालनी होगी क्यों की यह वायरस निकट भविष्य में हमारे साथ ही रहने वाला है।"
कुछ चिकित्सकों का मानना है की शायद यह वायरस अब हमारी ज़िंदगी से कभी जाए ही न जैसे अन्य कई वायरस भी सामने के बाद आज तक हमारे साथ बने हुए हैं और वैज्ञानिक आज भी उनका प्रॉपर इलाज और टीका बनाने में जुटे हुए हैं। बीते कुछ सालों में इबोला ने अफ्रीकी देशों की नींद उड़ा राखी है। इस वायरस का संबसे पहले पता यूँ तो 1976 में चला था लेकिन आज तक इसका कोई कारगर टीका नहीं बन सका है। वैज्ञानिकों का मानना है की वैक्सीन की ऐसे खतरनाक वायरस की वैक्सीन की तलाश सालों या दशकों तक भी चल सकती है. बावजूद इसके इस बात की कोई गारंटी नहीं की खरबों डॉलर खर्च करने के बाद भी कई बार कोशिशें बेकार चली जाती हैं। जब पहली बार इबोला के बारे में पता चला था तब इससे मरने वालों की मृत्यु दर 50 फ़ीसदी थी। वहीँ 2020 में भी इसकी कोई प्रभावी वैक्सीन नहीं बन पाई है। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन और कुछ देशों ने इसकी रोकथाम के लिए आख़िरकार एक वैक्सीन को मान्यता दे दी है।
आइये जानते हैं ऐसे ही चार जानलेवा कर खतरनाक वायरस के बारे में जिनके बारे में कहा जाता है की ये अब शायद ही कभी हमारी ज़िंदगी से जाएंगे क्यूंकि आज तक वैज्ञानिक इनके वैक्सीन बनाने में कामयाब नहीं हो सके है।
एड्स वायरस (HIV)
अफ्रीका में पहली बार ह्यूमन इम्यूनोडिफिशिएंसी वायरस यानी एचआईवी का पहली बार पता 70 के दशक में चला था। तीस साल से ज़्यादा का वक्त बीत जाने के बाद भी एचआईवी वायरस के लिए आज तक कोई कारगर दवा और टीका नहीं बनाया जा सका है। यह वायरस इंसानो में एड्स जैसी घातक और जानलेवा बीमारियों का कारण बनता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक एड्स की बीमारी की वजह से अब तक दुनिया भर में 3.2 करोड़ लोगों की जान जा चुकी है. आज करीब चार दशक बाद भी इसकी कोई दवा नहीं बन पाई है. पूरी दुनिया में चार करोड़ लोग इससे प्रभावित हो चुके है।
सार्स (सिवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम)
सार्स एक प्रकार का कोरोना वायरस ही है। इसके बारे में सबसे पहले 2003 में पता चला था। अभी तक के खोज के आधार पर यह माना जाता है कि यह चमगादड़ों से इंसान में आया है। चीन के गुआंगजू प्रांत में साल 2002 में इसके संक्रमण का पहला मामला सामने आया था। इस वायरस की वजह से सांस लेने की गंभीर बीमारी होती है। 2003 में 26 देशों में इससे करीब 8000 से ज़्यादा लोग संक्रमित हुए है। तब से इसके संक्रमण के कम ही मामले सामने आए है। इस वायरस का संक्रमण इंसानों से इंसानों में ही मुख्य तौर पर होता है और वास्तव में स्वास्थ्य केंद्रों पर ही इससे होने वाले संक्रमण के मामले ज़्यादा हैं क्योंकि वहाँ पर इसके संक्रमण को रोकने के लिए पर्याप्त एहतियात नहीं बरते गए थे। सार्स कोरोना वायरस के 8,400 से ज़्यादा संक्रमण के मामले सामने आए थे जिनमें 916 लोगों की मौत हुई थी, मृत्यु दर 11 फ़ीसदी है।
मर्स (Middle East respiratory syndrome-related corona virus)
मर्स-कोव भी एक तरह का कोरोना वायरस ही हैजो सबसे पहले 2012 में सामने आया था। इसकी वजह से Middle East respiratory syndrome-related Corona virus नाम की बीमारी होती है। इस बीमारी में मृत्यु दर अधिक है। नवंबर 2019 तक पूरी दुनिया में इस वायरस से 2494 लोग संक्रमित हुए थे. इनमें से 858 लोगों की मौत हो गई थी। इस वायरस के बारे में सबसे पहले सऊदी अरब में पता चला था लेकिन उसके बाद से 27 देशों में यह वायरस पाया जा चुका है। इनमें मध्य पूर्व के 12 देश शामिल हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक मध्य पूर्व से बाहर के जिन देशों में संक्रमण मामले मिले हैं वो भी इसी क्षेत्र में दरअसल संक्रमित हुए हैं। मूल तौर पर जानवरों से इंसानों में इस वायरस का संक्रमण होता है. अरबी ऊंट को इस वायरस का मुख्य स्रोत माना जाता है। इंसानों से इंसानों में होने वाले संक्रमण का मामला दुर्लभ है। मर्स और सार्स दोनों ही मामलों में स्थिति नियंत्रण आने के बाद वैक्सीन बनाने के प्रयास फ़िलहाल टाल दिए गए हैं।
एवियन इन्फ्लूएंजा (बर्ड फ़्लू)
90 के दशक के आख़िरी दौर से लेकर अब तक एवियन इन्फ्लूएंजा के दो प्रकार सामने आ चुके हैं और कई लोगों इससे संक्रमित हो चुके हैं और मारे जा चुके हैं। इस वायरस का चिड़ियों के मल से इंसानों में संक्रमण होता है। 1997 में एच5एन1 वायरस का सबसे पहले हांगकांग में पता चला था। अब तक अफ्रीका, एशिया और यूरोप के पचास से ज़्यादा देशों में यह वायरस पहुंच चुका है। इस वायरस से होने वाली मृत्यु दर 60 फ़ीसदी है। मई, 2013 में चीन में एच7एन9 का पता चला था, जहां वायरस के संक्रमण की छिटपुट घटनाएँ सामने आई थीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक 2013 और 2017 के बीच 1,565 संक्रमण के कुल मामले सामने आए थे इनमें से 39 फ़ीसदी संक्रमितों की मौत हुई थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक इस वायरस का इंसानों से इंसानों में होने वाला संक्रमण असमान्य है।