
नई दिल्ली। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (Banaras Hindu University) में एक मुस्लिम प्रोफेसर (Muslim Professor) की नियुक्ति को लेकर बवाल मचा हुआ है। विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान फैकल्टी( (Sanskrit Department) ) के साहित्य विभाग में एक मुस्लिम सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति के बाद विभाग के शोध छात्रों और अन्य छात्रों ने विश्वविद्यालय परिसर में कुलपति के निवास के पास होलकर भवन में धरना देना शुरू कर दिया।डिपार्टमेंट के छात्रों का कहना है की हमारा धर्मविज्ञान किसी दूसरे धर्म का व्यक्ति कैसे पढ़ा सकता है? इसी को लेकर छात्रों ने हंगामा मचा रखा है। लेकिन मुस्लिम प्रोफेसर की नियुक्ति का विरोध करने वाले लोग भूल गए की मुस्लिम धर्म ने कई ऐसे लोगों को भी दिए हैं, जिन्होंने संस्कृत को पूरे मन से माना है और इसे पढ़ाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी न्योछावर कर दी। आज हम आपको ऐसे ही कुछ मुस्लिम अध्यापकों के बारे में बताने जा रहे हैं।
हयात उल्ला
कौशांबी के रहने वाले हयात उल्ला ऐसे शख्स हैं जो पांच वक्त नमाज पढ़ता है लेकिन कर्म से वह संस्कृत भाषा का पुजारी है।संस्कृत के लिए उनका समर्पण देख लोग उन्हें पंडित हयात उल्ला "चतुर्वेदी" (Famous Sanskrit Scholar Pandit Hayat ullah)कह कर बुलाने लगे। 77 साल के हयात संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार, पढ़ने-पढ़ाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।
मौलाना 'चतुर्वेदी'
मेरठ के मौलाना महफ़ूज़ उर रहमान शाहीन जमाली बच्चों को कुरान की आयतों के साथ-साथ संस्कृत के श्लोक भी पढ़ाते हैं। मौलाना को हिंदुओं की धार्मिक पुस्तकों के साथ वेदों के बारे में भी बहुत रूची है। उनका संस्कृत का प्यार उनको नया नाम भी दिलवा दिया है। लोग उनको मौलाना 'चतुर्वेदी' (maulana chaturvedi)के नाम से बुलाते हैं।
नाहिद आबिदी
नाहिद आबिदी उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की रहने वाली हैं।नाहिद आबिदी ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पीएचडी की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने 2005 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अवैतनिक शिक्षक के रूप में पढ़ाना शुरू कर दिया, लेकिन जल्द ही उन्हें काशी विद्यापीठ में पार्ट टाइम लेक्चरर के रूप में नौकरी मिल गई। नाहिद ने एक किताब भी लिखी है दिसका नाम है 'संस्कृत साहित्य में रहीम'। इसके अलावा संस्कृत भाषा में उनके योगदान के लिए उन्हें साल 2014 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
मोहम्मद हनीफ खान शास्त्री
मोहम्मद हनीफ खान शास्त्री पांचों वक्त नमाज के साथ-साथ रोजाना गीता का एक अध्याय भी पढ़ते हैं । वे हज और चार धाम की यात्रा भी कर चुके हैं।कुरान को जितना मानते हैं उतनी ही तबज्जों गीता को भी देते हैं। वह गीता पर प्रवचन दे चुके हैं। इकसे साथ ही हनीफ खान ने कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत यूनिवर्सिटी, से वेद और कुरान के समन्वय पर ही पीएचडी की है।उन्होंने एक किताब भी लिखी है जिसका नाम है ‘मोहन गीता मोहम्मद का ‘मो’, हनीफ का ‘ह’ और खान से लिया ‘न’ मिलाकर बना मोहन। हनीफ दिल्ली में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। यूपी के सोनभद्र में रहने वाले हनीफ कहते हैं, ‘गीता ने मुझे नई जिंदगी दी। 10वीं में फेल हो गया था। निराश था। खुदकुशी करने का इरादा कर लिया था। अब यही मेरा जीवन है।
पंडित गुलाम दस्तगीर
मुंबई के वरली इलाके में रहने वाले गुलाम दस्तगीर को लोग'अस्सलामु-अलेकुम पंडित’ कहते हैं। गुलाम पिछले कई सालों से संस्कृत की सेवा कर रहे हैं। महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में पैदा हुए पंडित दस्तगीर ने लंबे समय तक मुंबई के वरली हाई स्कूल में संस्कृत की शिक्षा दी।