साल 1644 में बीकानेर (Bikaner) रियासत का सीलवा गांव ओैर नागौर रियासत (Nagaur State) का जाखणियां गांव में एक तरबूज के लिए भयंकर लड़ाई लड़ी गई थी। जिसमें हजारो सिपाही शहीद हो गए। यह लड़ाई दुनिया की एक मात्र ऐसी लड़ाई है जो की केवल एक फल के लिए लड़ी गयी और इतिहास में इसे "मतीरे की राड़" (matire ki rad) के नाम से जाना जाता है।
नई दिल्ली। गर्मी के मौसम में बाजार में तरबूज (watermelon) के ढेर लग जाते हैं। दुकानदार आपको तरबूज का एक टुकड़ा काटकर दिखाता होगा और उसके लाल रंग का वास्ता देकर आपको उसे खरीदने के लिए कहता है। लेकिन क्या आपने जानते हैं कभी तरबूज के चक्कर में हजारों लोगों का खून पानी की तरह बह गया था।
दरअसल, साल 1644 ईस्वी की जब बीकानेर (Bikaner) रियासत का सीलवा गांव ओैर नागौर रियासत का जाखणियां गांव में एक तरबूज के लिए भयंकर लड़ाई लड़ी गई थी। जिसमें हजारो सिपाही शहीद हो गए। यह लड़ाई दुनिया की एक मात्र ऐसी लड़ाई है जो की केवल एक फल के लिए लड़ी गयी और इतिहास में इसे "मतीरे की राड़" (matire ki rad) के नाम से जाना जाता है।
तरबूज के लिए छिड़ गयी थी जंग
बताया जाता है कि बीकानेर(Bikaner) रियासत का सीलवा गांव ओैर नागौर रियासत का जाखणियां गांव जो की एक दूसरे के समानांतर स्थित थे। यह दोनों गांव नागौर रियासत और बीकानेर (Bikaner) रियासत की अंतिम सीमा थे और एक तरबूज की फसल बीकानेर रियासत की सीमा में उगी लेकिन वो नागौर की सीमा में फ़ैल गयी। उस पर एक तरबूज को मतीरा कहा जाता था। अब दोनों गांवो दावा कर रहे थे फसल उनकी तरफ लगी है। जिसमें बाद मामला बढ़ गया और जंग तक पहुंच गया।
इतिहास के पन्नो में दर्ज है "मतीरे की राड़"
इसके बाद नागौर और बीकानेर की रियासतों के मध्य 'मतीरे' यानी तरबूज को लेकर झगड़ा हो गया और यह झगड़ा युद्ध में तब्दील हो गया। इस युद्ध में नागौर की सेना का नेतृत्व सिंघवी सुखमल ने किया जबकि बीकानेर की सेना का नेतृत्व रामचंद्र मुखिया ने किया था। ये मतीरे का युद्ध इतिहास में "मतीरे की राड़" के नाम से जाना जाता है।
हजारों सिपाहियों का बहा खून
बीकानेर के शासक राजा करणसिंह और नागौर के शासक राव अमरसिंह का कहना था की तरबूज का हक उनके शियासत को मिलना चाहिए। इस बात पर झगड़ा इतना बढ़ा कि दोनों तरफ के गांव के लोग रात-रातभर जागकर पहरा देने लगे कि दूसरे पक्ष के लोग तरबूज न उखाड़ लें।
फैसला न हो पाने पर आखिरकार राव अमरसिंह ने इसकी शिकायत की तो राजा करणसिंह ने सलावतखां बख्शी को पत्र लिखा और बीकानेर की पैरवी करने को कहा था। लेकिन यह मामला मुग़ल दरबार में चलता उससे पहले ही युद्ध हो गया। इस युद्ध में नागौर की हार हुई । बीकानेर की सेना जीत गयी और उन्हें यह तरबूज मिला। लेकिन इस युद्ध में दोनों तरफ के हजारों सैनिक शहीद हो गए।