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नोटबंदी के 3 साल, आखिर क्यों नहीं हैं सरकार के पास आंकड़ें?

8 नवंबर 2016 की रात 8 बजे हुई थी नोटबंदी कैश लेनदेन करने वालों को हुआ नुकसान

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नई दिल्ली:8 नवंबर 2016 तारीख जब भी आती है, तो लोगों की वो पुरानी यादें ताजा हो जाती है। हम बात कर रहे हैं नोटबंदी की। आम आदमी से लेकर नेताओं तक को पैसों के लिए बैंकों की लाइनों में लगना पड़ा था। लेकिन 3 साल होने के मौके पर भी अब केंद्र सरकार इससे किनारा करती हुई नजर आ रही है। आखिर ऐसा क्यों है कि अब खुद केंद्र सरकार ही इस पर बात नहीं करना चाहती?

माना जा रहा है कि सरकार द्वारा इसे लागू तो किया गया, लेकिन इसकी सफलता को लेकर पुख्ता आंकडे सरकार के पास नहीं है। आखिर ऐसा क्यों? पीएम समेत सत्ता दल के बड़े नेता इस मुद्दे पर बात करने से बचते हुए नजर आते हैं क्योंकि नोटबंदी ( Notebandi ) के फैसले से पूरे देश में अफरा-तफरी का माहौल हो गया था। वहीं संगठित और असंगठित क्षेत्रों के कारोबार पर पड़ा क्योंकि माना ये जा रहा है कि सरकार के पास इनके लिए कोई खास तैयारी नहीं थी। वहीं नोटबंदी का सबसे बड़ा असर उन उद्योगों पर पड़ा जिनका लेनदेन कैश में चलता था।

हालांकि, सरकार चाहती थी कि ज्यादातर लेनदेन डिजिटल माध्यम से हो ताकि लेनदेन की जानकारी बैंकों और सरकार के पास हो। सोच सही थी, लेकिन इन उद्योगों को नोटबंदी से नुकसान काफी हुआ। जो कंपनियां कैश में लेन-देन करती थी या तो वो पूरी तरह बंद हो गई या फिर लोगों की छटनी कर दी गई। ऐसे में लोगों से उनकी नौकरियां छीन गई। हालांकि, सरकार ने नोटबंदी करने की वजह कालेधन का खात्मा करना, सर्कुलेशन में मौजूद नकली नोटों को खत्म करना, आतंकवाद और नक्सल गतिविधियों पर लगाम कसने समेत कैशलेस इकोनॉमी को बढ़ावा देने जैसी वजह बताई। वहीं आरबीआई के आंकड़ों की मानें तो नोटबंदी के दौरान बंद हुए 500 और 1000 के पुराने नोट 99.30 फीसदी बैंकों में वापस आए, तो फिर जब सारा पैसा वापस आ गया, तो फिर सरकार के पास पर्याप्त आंकड़ें क्यों नहीं है?

Published on:
08 Nov 2019 11:22 am
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