हुबली

दक्षिण भारत में हिंदी की नई पहचान: प्रो. पवार ने नवाचारों से बदली शोध और शिक्षा की तस्वीर

दक्षिण भारत जैसे अहिंदी भाषी क्षेत्र में हिंदी को नई पहचान देना आसान नहीं था, लेकिन कर्नाटक विश्वविद्यालय, धारवाड़ के हिंदी विभाग ने पिछले एक दशक में जिस तरह शैक्षणिक, शोध और सामाजिक स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है, उसमें प्रो. सीताराम के. पवार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। विभाग में समकालीन विषयों पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों की शुरुआत, ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को स्नातकोत्तर और शोध शिक्षा से जोडऩा, हिंदी को सामाजिक विमर्शों से जोडऩा तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शैक्षणिक संवाद का मंच तैयार करना उनके प्रमुख नवाचारों में शामिल है। गरीब बंजारा परिवार से निकलकर शिक्षा जगत में ऊंचाइयों तक पहुंचे प्रो. पवार ने राजस्थान पत्रिका से विशेष बातचीत में अपने संघर्ष, हिंदी के प्रचार-प्रसार और विभागीय उपलब्धियों पर विस्तार से चर्चा की।

less than 1 minute read
प्रोफेसर सीताराम के. पवार

सवाल: दक्षिण भारत में हिंदी को आगे बढ़ाना कितना चुनौतीपूर्ण रहा?
पवार:
दक्षिण भारत में हिंदी के प्रति रुचि तो थी, लेकिन उसे व्यवस्थित शैक्षणिक मंच देने की आवश्यकता थी। हमारा प्रयास रहा कि हिंदी केवल भाषा बनकर न रहे, बल्कि शोध, संवाद और समाज से जुडऩे का माध्यम बने। हमने विद्यार्थियों को रोजगार, शोध और समकालीन विषयों से जोडऩे की दिशा में कार्य किया।

सवाल: हिंदी विभाग में आपने कौन-कौन से नवाचार किए?
पवार:
पिछले बारह वर्षों में विभाग में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों की एक नई परंपरा शुरू की गई। समकालीन भारतीय साहित्य, किसान, श्रमिक, आदिवासी, महिला, किन्नर, पर्यावरण और सामाजिक विमर्श जैसे विषयों को केंद्र में रखकर कार्यक्रम आयोजित किए गए। इससे हिंदी विभाग का दायरा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैचारिक संवाद का मंच बन गया।

सवाल: ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए क्या विशेष प्रयास किए गए?
पवार:
मेरी प्राथमिकता हमेशा ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों को आगे लाना रही। हमने उन्हें स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएच.डी. शिक्षा के लिए प्रेरित किया। आज विभाग में हर वर्ष 50 से 60 विद्यार्थी स्नातकोत्तर और लगभग 20 विद्यार्थी पीएच.डी. कर रहे हैं। यह हिंदी शिक्षा के विस्तार की बड़ी उपलब्धि है।

सवाल: आपका अपना संघर्ष आपको क्या सिखाता है?
पवार:
मेरा जन्म एक गरीब बंजारा परिवार में हुआ। कठिन परिस्थितियों में शिक्षा प्राप्त की। संघर्ष ने मुझे सिखाया कि परिस्थितियां बाधा नहीं, बल्कि आगे बढऩे की प्रेरणा बन सकती हैं। इसलिए आज भी मैं विद्यार्थियों को यही संदेश देता हूं कि शिक्षा ही सबसे बड़ी शक्ति है।

सवाल: आने वाले समय में हिंदी विभाग की क्या योजनाएं हैं?
पवार:
हमारा प्रयास विभाग को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत बनाना है। इसी कड़ी में आगामी दिनों में विश्वशांति में समकालीन भारतीय साहित्य एवं प्रवासी साहित्य का योगदान विषय पर षष्ठम अंतरराष्ट्रीय विचार संगोष्ठी आयोजित की जा रही है।

Updated on:
20 May 2026 09:09 pm
Published on:
20 May 2026 09:05 pm
Also Read
View All
आंधी और बारिश ने उजाड़ी किसानों की उम्मीदें, कलबुर्गी में 500 एकड़ केले की फसल तबाह

चंद्रमौलेश्वर मंदिर: दीवारों, स्तंभों और पत्थरों पर कलात्मक नक्काशी, 900 वर्ष पुराना मंदिर पश्चिमी चालुक्य वास्तुकला की उत्कृष्ट पहचान

अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस: चाय की चुस्कियों में बसती है अपनापन और संवाद की संस्कृति, सुबह की शुरुआत से मेहमाननवाजी तक, लोगों के जीवन में ऐसे घुली चाय

अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस विशेष: टॉय ट्रेन से थिएटर कोच तक, यहां हर कोना सुनाता है भारतीय रेल की कहानी

जोशी ने कहा- देशभर में 160 से अधिक वंदे भारत ट्रेनें चल रही, कर्नाटक में लगभग 3,700 किलोमीटर रेलवे विद्युतीकरण का कार्य पूरा