
भवरलाल जैन पिछले 36 वर्षों से आयंबिल तप कर रहे हैं। उनका मानना है कि आयंबिल केवल तपस्या नहीं, बल्कि आत्मसंयम का अभ्यास है। इससे आत्मबल बढ़ता है, सोच सकारात्मक बनती है और क्रोध पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है।
जैन धर्म में आयंबिल तप का विशेष महत्व है। इसमें साधक निर्धारित नियमों के अनुसार दिन में एक बार सादा भोजन ग्रहण करता है। भोजन में अनाज और दालों को उबालकर सीमित पदार्थों के साथ लिया जाता है। इस दौरान तेल, घी, दूध, दही, मिठाई, फल, हरी सब्जियों और स्वाद बढ़ाने वाली अन्य वस्तुओं का त्याग किया जाता है। इस तप का उद्देश्य स्वाद की लालसा पर नियंत्रण रखते हुए मन को धार्मिक साधना की ओर केंद्रित करना है।
भवरलाल जैन की तपस्या का सिलसिला वर्षों से जारी है। उन्होंने पिछले वर्ष भी 91 दिन तक आयंबिल किया था। इसके अलावा वे अब तक 47 बार आठ दिन की अट्ठाई सहित नौ, 11 और 15 दिन की तपस्या कर चुके हैं। वर्धमान तप की ओली भी 43 बार पूरी कर चुके हैं।
भवरलाल जैन के साथ उनका परिवार भी धार्मिक साधना में सहभागी है। उनकी पत्नी गुलाब बी. जैन, बेटी पायल जी. सालेचा, बेटे प्रदीप बी. जैन और बहू अर्पिता पी. जैन ने नौ दिन की नवपद ओली की है। उनके बड़े भाई मदनलाल सी. जैन लक्की भी 39 आयंबिल और 11 उपवास कर चुके हैं।
इस तरह परिवार के कई सदस्य तपस्या और धार्मिक आराधना से जुड़े हुए हैं। भंवरलाल जैन की 100 दिन की आयंबिल साधना उनके लंबे धार्मिक अनुशासन और आत्मसंयम के संकल्प को दर्शाती है।