
मंदिर के पुजारी के अनुसार, गणपति के विभिन्न स्वरूपों के दर्शन के लिए हुब्बल्ली के अलावा गदग, बेलगावी, सिरसी, बागलकोट, बादामी और राणेबेन्नूर सहित उत्तर एवं मध्य कर्नाटक के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। गोवा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश से भी भक्त यहां दर्शन के लिए आते हैं। कार्तिक मास में मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।
मंदिर परिसर में स्थित विशाल अश्वत्थनारायण वृक्ष भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण है। वृक्ष के चारों ओर और उससे सटे क्षेत्र में 108 शिवलिंग स्थापित हैं। परिसर में नवग्रह, पंचमुखी आंजनेय और दत्तात्रेय की प्रतिमाएं भी हैं। अष्टविनायक के समीप करीब पांच फीट ऊंची सुब्रमण्यम की प्रतिमा के साथ नागदेवता और दत्तात्रेय की प्रतिमाएं भी विराजमान हैं।
मंदिर में शिवलिंग के सामने काले पत्थर से बना विशाल नंदी विराजमान है। मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, नंदी का वजन करीब 11 टन है। विशाल आकार और काले पत्थर की यह प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए कौतूहल का विषय बनी रहती है।
मंदिर की पुरानी धार्मिक परंपराओं की एक निशानी परिसर के बाहर मुख्य सड़क के समीप रखा करीब छह फीट ऊंचा पत्थर का रथ का पहिया भी है। मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, पहले शोभायात्रा के दौरान इसी पहिए वाले रथ का उपयोग किया जाता था। आज यह पहिया मंदिर की पुरानी परंपराओं की याद दिलाता है।
मंदिर में दशहरा, दीपावली, महाशिवरात्रि और श्रावण मास के दौरान विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। अमावस्या पर पूजा तथा प्रत्येक सोमवार को विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इन अवसरों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं।
कांतिलाल पुरोहित, श्रद्धालु एवं व्यवसायी, हुब्बल्ली ने कहा कि मंदिर क्षेत्र में काफी प्रसिद्ध है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन प्रतिमाएं और धार्मिक स्वरूप इसकी खास पहचान हैं। मंदिर पुराना होने के साथ ही लोगों की गहरी आस्था से जुड़ा हुआ है। पर्व-त्योहारों और विशेष अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ जाती है।