
ग्रामीण क्षेत्रों की सरकारी स्कूलों को बंद कर रहे
प्रदर्शन को संबोधित करते हुए सार्वजनिक शिक्षा बचाओ जिला समिति के उपाध्यक्ष शरणबसव गोनवार ने कहा कि सरकार एक ओर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के नाम पर केपीएस स्कूल शुरू कर रही है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों की सरकारी स्कूलों को बंद कर रही है। उन्होंने कहा कि महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों को उनके अपने समाज और गांव में शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए संघर्ष किया था। उसी सोच के आधार पर गांव-गांव में सरकारी स्कूल स्थापित किए गए, लेकिन अब सरकार इन्हें बंद कर शिक्षा व्यवस्था को कमजोर कर रही है।
बच्चे पढ़ाई बीच में ही छोडऩे को मजबूर
उन्होंने आरोप लगाया कि गांव की स्कूलों को बंद करने से गरीब परिवारों के बच्चों को दूर-दराज की स्कूलों तक जाना पड़ेगा, जिससे अनेक बच्चे पढ़ाई बीच में ही छोडऩे को मजबूर हो जाएंगे। उन्होंने बताया कि बुदरसिंगी से करीब चार किलोमीटर दूर स्थित अतरगुंची केपीएस स्कूल तक छोटे बच्चों का प्रतिदिन जाना संभव नहीं है। गांव के अधिकांश परिवार मजदूरी कर जीवनयापन करते हैं और ऐसी स्थिति में दूर स्कूल भेजना उनके लिए कठिन होगा। उन्होंने कहा कि यदि गांव की स्कूल बंद हुई तो कई बच्चों की पढ़ाई छूट जाएगी, जिसे ग्रामीण किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे।
सरकार के निर्णय का विरोध
सार्वजनिक शिक्षा बचाओ समिति की उपाध्यक्ष गंगा जे. हुक्किनकेरी ने भी सरकार के निर्णय का विरोध करते हुए कहा कि गांव में यही एकमात्र स्कूल है और इसके बंद होने के बाद बच्चों को राष्ट्रीय राजमार्ग पार कर दूसरी स्कूल जाना पड़ेगा। इससे बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर खतरा उत्पन्न होगा। प्रदर्शन के अंत में ग्रामीणों ने गांव की स्कूल बचाने के लिए सार्वजनिक शिक्षा बचाओ समितियों का गठन किया और सरकार द्वारा निर्णय वापस लिए जाने तक आंदोलन को और मजबूत बनाने का संकल्प लिया। इस दौरान मुल्ला साब सैदन्नवर, हीना कौसर एम. सैदन्नवर, अंजुमा एच. मुंदिनमनी, शेकप्पा जगलूर, सुभाष जगलूर सहित बड़ी संख्या में अभिभावक और ग्रामीण उपस्थित थे।