
राजस्थानी परिवारों में दीपावली की तैयारियां घर की सफाई और सजावट से लेकर पूजा-पाठ तक फैली होती हैं। दरवाजों पर तोरण, आंगन में रंगोली, पूजा स्थल पर दीपक और परिवार के साथ लक्ष्मी-गणेश की आराधना त्योहार की पारंपरिक छटा को साकार करते हैं। कई परिवारों में आज भी घर पर मिठाइयां बनाने, मिट्टी के दीपक जलाने और बड़ों का आशीर्वाद लेने की परंपरा कायम है। बुजुर्गों के लिए यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार को एक साथ जोड़ने वाला अवसर है। पूजा के दौरान बच्चों को रीति-रिवाजों का महत्व समझाना, पारिवारिक परंपराओं की कहानियां सुनाना और त्योहारों से जुड़ी मान्यताओं से परिचित कराना संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का सहज माध्यम बनता है।
कर्नाटक में जन्मे और पले-बढ़े बच्चों के लिए राजस्थान कई बार माता-पिता या दादा-दादी की यादों के माध्यम से जाना-पहचाना प्रदेश होता है। दीपावली जैसे त्योहार उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों को करीब से समझने का अवसर देते हैं। घर में राजस्थानी भाषा सुनना, पारंपरिक पकवानों का स्वाद लेना, पूजा में भाग लेना और बड़ों से त्योहारों की कहानियां सुनना उन्हें अपनी विरासत से जोड़ता है। आज की पीढ़ी आधुनिक सजावट, बिजली की रोशनी और नए तौर-तरीकों के साथ त्योहार मनाती है। इसके बावजूद पारंपरिक दीपक जलाना, परिवार के साथ पूजा करना और बड़ों का आशीर्वाद लेना जैसी परंपराएं पीढ़ियों के बीच सेतु का काम करती हैं। परिवारों के सामने चुनौती यही है कि आधुनिकता के साथ कदम मिलाते हुए बच्चों को अपनी भाषा, लोकसंस्कृति और पारिवारिक मूल्यों से भी परिचित कराया जाए।
लंबे समय से कर्नाटक में रह रहे राजस्थानी परिवारों के लिए यहां की संस्कृति भी जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। स्थानीय त्योहारों, खानपान और सामाजिक परंपराओं के बीच उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है। उनकी सांस्कृतिक दुनिया अब राजस्थान और कर्नाटक, दोनों की परंपराओं से मिलकर बनी है। दीपावली पर घरों में जलते दीपक, पूजा की थाली, पारंपरिक मिठाइयां और अपनों के साथ खुशियां बांटने का उत्साह इस बात का प्रतीक है कि दूरी से अपनी जड़ों का रिश्ता कमजोर नहीं होता। समय के साथ त्योहारों का अंदाज बदल सकता है, लेकिन परिवार का साथ, परंपराओं के प्रति सम्मान और खुशियां बांटने की भावना आज भी कायम है। यही वजह है कि कर्नाटक में बसे इन परिवारों के घर-आंगन में दीपावली के साथ राजस्थान की माटी की खुशबू भी महकती है।
राजस्थान के बालोतरा जिले के आसोतरा निवासी रेखा कवाड़ के लिए दीपावली परिवार और कारोबार, दोनों के लिहाज से खास है। वे कहती हैं कि व्यावसायिक व्यस्तताओं के बावजूद दीपावली की तैयारियों और परंपराओं के लिए समय निकालती हैं। घर की सफाई से लेकर पूजा तक, त्योहार के हर पहलू का ध्यान रखा जाता है। कार्यालय में भी पूजा का आयोजन होता है। रेखा कवाड़ के अनुसार, दीपावली की खुशियां केवल परिवार तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। वे कर्मचारियों के साथ भी त्योहार की खुशियां साझा करती हैं। कर्मचारियों के लिए भोजन की व्यवस्था करने, उन्हें कपड़े देने और एक महीने का बोनस देने के साथ बच्चों के लिए मिठाइयों का भी इंतजाम किया जाता है। उनके लिए दीपावली का अर्थ कारोबार की सफलता के साथ उन लोगों की खुशियों में भागीदार बनना भी है, जो पूरे साल कारोबार को आगे बढ़ाने में योगदान देते हैं।
बालोतरा जिले के मोकलसर की रहने वाली कविता बाफना कहती हैं कि राजस्थान से दूर रहने के बावजूद दीपावली मनाने का उत्साह कम नहीं हुआ है। घर और दुकान में पूजा की जाती है। इसके बाद परिचितों और रिश्तेदारों के यहां जाकर दीपावली की शुभकामनाएं दी जाती हैं और मिठाइयां बांटी जाती हैं। उनके अनुसार, राजस्थान में जिस उत्साह और उमंग के साथ दीपावली मनाई जाती है, वैसा ही माहौल कर्नाटक में भी देखने को मिलता है। प्रवासी परिवार यहां रहते हुए अपनी परंपराओं को पूरे उत्साह से आगे बढ़ा रहे हैं। त्योहारों के मौके पर रिश्तेदारों, मित्रों और समाज के लोगों से मिलना-जुलना आपसी संबंधों को मजबूत करता है। इस तरह दीपावली केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप और अपनत्व का अवसर भी बन जाती है।
राजस्थान के बीकानेर मूल की हुब्बल्ली प्रवासी कंचन सिंघानिया का अपनी जन्मभूमि से जुड़ाव आज भी उनके खानपान और त्योहार मनाने के तरीके में नजर आता है। वे बताती हैं कि दीपावली पर वे स्वयं घर में मिठाइयां तैयार करती हैं। केवल दीपावली ही नहीं, अन्य तीज-त्योहारों और पर्वों पर भी घर पर मिठाई बनाने की परंपरा निभाती हैं। वे बाजार से मिठाई खरीदने के बजाय अपने हाथों से पकवान तैयार करना पसंद करती हैं। कंचन के लिए दीपावली खुशियों को मिलकर मनाने और एक-दूसरे के साथ बांटने का पर्व है। घर में तैयार मिठाइयां परिवार और परिचितों के बीच खुशियां बांटने का माध्यम बनती हैं। उनका मानना है कि दीपावली जीवन में रोशनी और सकारात्मकता भरने वाला त्योहार है। घर में अपने हाथों से मिठाई बनाने की परंपरा उन्हें राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत और बचपन की यादों से जोड़े रखती है।
राजस्थान के बालोतरा जिले के थोब निवासी गीगी देवी चौधरी को अपने बचपन की दीपावली आज भी याद है। वे बताती हैं कि पहले दीपावली की तैयारियां करीब एक महीने पहले ही शुरू हो जाती थीं। पूरे घर की गाय के गोबर से लिपाई की जाती थी और दीवारों पर चूने से सफेदी होती थी। घर में देशी घी से मिठाइयां बनाई जाती थीं और देशी तिल के तेल से दीपक जलाए जाते थे। उनके अनुसार, पहले दीपावली की तैयारियों में पूरे परिवार की भागीदारी रहती थी। घर की सफाई, सजावट और पकवान बनाने की प्रक्रिया त्योहार के उत्साह को कई दिन पहले ही शुरू कर देती थी। अब व्यस्त जीवनशैली के कारण कई बार दीपावली आने का अहसास त्योहार से कुछ दिन पहले ही होता है। पारंपरिक दीपकों की जगह बिजली की झालरों और चाइनीज लाइटों का इस्तेमाल बढ़ गया है। गीगी देवी के अनुभवों में दीपावली के बदलते स्वरूप के साथ बीते समय की सादगी और पारिवारिक अपनत्व की यादें भी झलकती हैं।