धारवाड़ जैसे शैक्षणिक गौरव वाले जिले में यदि सरकारी पीयू कॉलेज वर्षों से प्राचार्य और शिक्षकों के बिना चल रहे हों, तो यह महज एक प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर विफलता है। 111 में से 12 कॉलेजों में प्राचार्य नहीं और 79 शिक्षकीय पद लंबे समय से रिक्त। ये आंकड़े बताते हैं कि […]
धारवाड़ जैसे शैक्षणिक गौरव वाले जिले में यदि सरकारी पीयू कॉलेज वर्षों से प्राचार्य और शिक्षकों के बिना चल रहे हों, तो यह महज एक प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर विफलता है। 111 में से 12 कॉलेजों में प्राचार्य नहीं और 79 शिक्षकीय पद लंबे समय से रिक्त। ये आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा तदर्थ व्यवस्थाओं के सहारे ढकेली जा रही है। संस्थान चल तो रहे हैं, लेकिन दिशा, अनुशासन और शैक्षणिक नेतृत्व के बिना। परीक्षा परिणामों में गिरावट इस लापरवाही की सीधी कीमत है। 2024 में 80.2 प्रतिशत से 2025 में 72 प्रतिशत पर आना कोई सामान्य उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि शैक्षणिक गुणवत्ता में आई कमजोरी का प्रमाण है। जब गणित, रसायन विज्ञान, अंग्रेजी, इतिहास और वाणिज्य जैसे मुख्य विषयों के विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं होंगे, तो परिणाम बेहतर कैसे होंगे? विद्यार्थियों से उत्कृष्ट प्रदर्शन की अपेक्षा की जाती है, पर क्या व्यवस्था ने उन्हें समान स्तर की तैयारी का अवसर दिया?
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि 2013 के बाद नियमित नियुक्तियां लगभग ठप क्यों रहीं? सेवानिवृत्त प्राचार्यों की जगह नई नियुक्ति न होना और वरिष्ठ व्याख्याताओं को अतिरिक्त प्रभार देकर काम चलाना यह दर्शाता है कि शिक्षा विभाग ने समस्या को टालने की नीति अपनाई। शिक्षा कोई ऐसा क्षेत्र नहीं, जहां अस्थायी समाधान लंबे समय तक चल सकें। हर वर्ष की देरी सैकड़ों विद्यार्थियों के अवसर सीमित कर देती है। सरकार ने 814 व्याख्याताओं और 242 प्राचार्यों की भर्ती को मंजूरी दी, पर उच्च न्यायालय में प्रक्रिया पर रोक लगने से मामला अटक गया। कानूनी अड़चनें अपनी जगह हैं, लेकिन समाधान खोजने की राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक तत्परता भी उतनी ही आवश्यक है। यदि नियुक्तियां वर्षों तक कागजों में उलझी रहेंगी, तो नुकसान केवल विद्यार्थियों का होगा।
सबसे अधिक प्रभावित वे छात्र हैं जो ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आते हैं। निजी कॉलेजों की ऊँची फीस उनके लिए विकल्प नहीं। सरकारी कॉलेज ही उनके सपनों का आधार हैं। यदि यही संस्थान कमजोर पड़ेंगे, तो सामाजिक न्याय और समान अवसर की अवधारणा भी खोखली साबित होगी। अब प्रश्न यह नहीं कि पद कब भरेंगे, बल्कि यह है कि जिम्मेदारी कौन लेगा? शिक्षा में लापरवाही का प्रभाव तत्काल नहीं, दीर्घकालिक होता है और उसका दंश पूरी पीढ़ी झेलती है। खाली कुर्सियाँ केवल फर्नीचर की कमी नहीं, बल्कि जवाबदेही की भी कमी का प्रतीक बनती जा रही हैं। समय रहते ठोस और निर्णायक कदम उठाना ही भविष्य को सुरक्षित कर सकता है।