19 फ़रवरी 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

रस्म और रिश्तों का संगम: साफा सम्मान से सजी पहचान, कर्मभूमि कर्नाटक में गूंज रहा राजस्थान

परंपरा, संस्कृति और गौरव कर्नाटक को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले राजस्थान मूल के लोग आज भी अपनी परंपरा, संस्कृति और गौरव के प्रतीक राजस्थानी साफा को जीवंत बनाए हुए हैं। सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अतिथियों के स्वागत से लेकर आर्थिक सहयोग करने वाले दानदाताओं के सम्मान तक, हर अवसर पर साफा पहनाकर सम्मानित […]

2 min read
Google source verification
हुब्बल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में राजस्थानी साफे में प्रवासी। (फाइल फोटो)

हुब्बल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में राजस्थानी साफे में प्रवासी। (फाइल फोटो)

परंपरा, संस्कृति और गौरव

कर्नाटक को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले राजस्थान मूल के लोग आज भी अपनी परंपरा, संस्कृति और गौरव के प्रतीक राजस्थानी साफा को जीवंत बनाए हुए हैं। सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अतिथियों के स्वागत से लेकर आर्थिक सहयोग करने वाले दानदाताओं के सम्मान तक, हर अवसर पर साफा पहनाकर सम्मानित करने की परंपरा यहां विशेष पहचान बन चुकी है। हुब्बल्ली में बसे राजस्थान मूल के परिवार विभिन्न समाज स्तर पर अनेक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। महाशिवरात्रि, जयंती समारोह, धार्मिक अनुष्ठान, खेलकूद आयोजन, सामूहिक सभाएं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में समाजजन भाग लेते हैं। इन आयोजनों में बाहर से आने वाले अतिथियों, वक्ताओं और समाजसेवियों का सम्मान साफा पहनाकर किया जाता है।

संस्कृति से जुड़ाव का सशक्त माध्यम
राजस्थान मूल के लोग कर्नाटक में व्यापार और विभिन्न व्यवसायों से जुड़े हैं। कई परिवार दशकों से हुब्बल्ली में निवास कर रहे हैं, परंतु अपनी जड़ों से उनका जुड़ाव साफा जैसी परंपराओं के माध्यम से स्पष्ट झलकता है। साफा सम्मान की यह परंपरा न केवल समाज में एकता और गौरव की भावना को सुदृढ़ करती है, बल्कि नई पीढ़ी को भी अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराती है। कर्नाटक की धरती पर राजस्थान की यह रंगीन पहचान—साफे के माध्यम से—धर्म, संस्कार और संस्कृति के प्रचार-प्रसार का सशक्त उदाहरण बन रही है।

राजस्थान से विशेष रूप से मंगवाए जाते हैं साफे
इन साफों की खासियत यह है कि इन्हें सीधे राजस्थान के विभिन्न शहरों जैसे भीनमाल, जोधपुर, पाली आदि से मंगवाया जाता है। रंगों की विविधता, कपड़े की गुणवत्ता, बंधेज और लहरिया की पारंपरिक छाप, तथा बांधने की विशिष्ट शैली इन्हें अलग पहचान देती है। राजस्थान का साफा केवल सिर पर बांधा जाने वाला वस्त्र नहीं, बल्कि सम्मान, स्वाभिमान और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक है। इसकी चमकदार रंगत और विशिष्ट बनावट देखते ही राजस्थान की पहचान दृष्टिगोचर हो जाती है।

राजस्थान के साफों का अलग ही महत्व
हुब्बल्ली प्रवासी बिजनेसमैन मालाराम देवासी बिठूजा कहते हैं, स्थानीय बाजार में इस प्रकार के पारंपरिक और विशिष्ट डिजाइन वाले साफे उपलब्ध नहीं होते, इसलिए विशेष ऑर्डर देकर राजस्थान से मंगवाए जाते हैं। हमारे देवासी समाज के महाशिवरात्रि पर आयोजित कार्यक्रम में 65 साफे हमने राजस्थान के भीनमाल से मंगवाए। राजस्थान के साफों का अलग ही महत्व है।