
इंदौर. बेटा ये नौकरी छोड़ दे। इसमें पल-पल खतरा है। कभी कुछ हो गया तो हम तो मर ही जाएंगे। तेरे सिवा हमारा है ही कौन? ये बात नक्सली हमले में शहीद हुए सागर के लाजपतपुरा वार्ड निवासी प्रदीप लारिया की मां ने तब कही थी, जब प्रदीप एक अन्य हमले में शहीद हुए अपने चचेरे भाई सुनीत लारिया की पुण्यतिथि में शामिल होने सागर आए थे। मां की इस चिंता पर तब प्रदीप ने कहा था कि मां जिंदगी और मौत तो ऊपर वाले के हाथ में होती है। मेरे लिए देश सेवा से बढ़कर कुछ भी नहीं है। इसमें भले ही मेरे प्राण क्यों न चले जाएं...। यह कहकर प्रदीप उड़ीसा रवाना हो गए।
वह साल 2002 का अगस्त महीना था और तारीख 11 थी। इस दिन जब प्रदीप अपने साथियों के साथ उड़ीसा के गोदाल पादर जिले के गुनुपुर गांव के पास गश्त कर रहे थे, तभी वहां नक्सलियों ने उनके वाहन को सुरंग में ब्लास्ट कर उड़ा दिया था। धमाके में वाहन समेत प्रदीप करीब 25 फीट दूर फिका गए थे।
दुश्मनों को किसी भी कीमत पर मत छोडऩा
जमीन पर गिरते ही अपने साथियों से उनके पहले शब्द थे कि दुश्मनों को किसी भी कीमत पर छोडऩा नहीं है, चाहे कुछ भी हो जाए। बस इतना कहते ही उनकी आंखें हमेशा के लिए बंद हो गई। उनके पार्थिव शरीर को स्वतंत्रता दिवस के दिन सागर लाया गया था और पूरे सम्मान के साथ पंचतत्व में विलीन किया गया था। एक अच्छे देश सेवक के साथ प्रदीप बेहतरीन क्रिकेटर भी थे। उनके मोहल्ले के सभी लोग उन्हें जडेजा कहकर बुलाते थे। बचपन में अपने पिता को खो देने के बाद प्रदीप ने काफी संघर्ष किया। बमुश्किल पढ़ाई की और एनसीसी में उम्दा प्रदर्शन करते हुए सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे।
पेंशन से हो रही गुजर-बसर
प्रदीप के बड़े भाई प्रमोद बताते हैं कि वह हमारे घर की शान था। घर में उसे भले ही गुस्सा नहीं आता था लेकिन देशसेवा के प्रति उसका जज्बा और दुश्मनों के खिलाफ वह आग सी उगलता था। जब भी घर आता था बस सीमा और सुरक्षा की बातें करता रहता था। डबडबाती आंखों से मां पानबाई कहती हैं कि मैंने उसे तब रोका था। यदि नहीं गया होता तो आज मेरा लाल मेरे साथ होता। प्रदीप ने देश सेवा के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी लेकिन सरकार हमारे लिए कुछ नहीं कर रही है। शुरू में ही कुछ मदद मिली थी। अब उसकी पेंशन मात्र से परिवार की गुजर-बसर होती है।
बचपन में ही सिर से उठ गया था पिता का साया
छोटी सी उम्र में प्रदीप के सिर से पिता का साया उठ गया। घर की हालत भी ज्यादा अच्छी नहीं थी। किसी तरह गाड़ी चलती रही। फिर एनसीसी में दम दिखाया तो सीआरपीएफ में चयन हो गया। महज एक साल नौकरी करने के बाद नक्सली हमले में शहीद हो गए। आज उनकी कुर्बानी को याद कर हर किसी की आंखें भर आती हैं।