शहर से नजदीक एक गांव एेसा भी है, जहां आज भी सवर्णों और दलितों के बीच असमानता का व्यवहार देखा जा रहा है। यहां आज भी अंतिम संस्कार के लिए सवर्णों का अलग श्मशान घाट है और दलितों के लिए अलग। बताया जा रहा है कि जिस जमीन पर सवर्णों ने श्मशान बनाया है, वह उनकी निजी भूमि है इसलिए वहां कोई भी दलित को अंतिम संस्कार की इजाजत नहीं है। सवर्णों ने यहां एेसा प्रभाव बना रखा है, कोई भी दलित परिवार उनकी खींची रेखा लांघने की कोशिश भी नहीं कर सकता। सवर्णों के श्मशान तक दलित न जाएं, इसलिए उनके लिए एक अलग श्मशान बनवाया है।
डर से कोई नहीं करता विरोध
कनाडि़या ग्राम को हाल में हुए परिसीमन के दौरान नगर निगम में शामिल किया जा चुका है। बिचौली हप्सी, कनाडि़या, बिचौली मर्दाना को मिलाकर इसे वार्ड 76 बनाया गया है। नगरीय सीमा में आने के बावजूद इस रूढ़ीवादी परंपरा का विरोध करने की गांव में किसी दलित में हिम्मत नहीं है। कोई भी दलित इस परंपरा को तोडऩे की कोशिश सिर्फ इसी आशंका के चलते नहीं करता कि सवर्ण मिलकर उसका जीना मुश्किल कर देंगे।
35 प्रतिशत से ज्यादा दलित
गांव में 35 प्रतिशत से ज्यादा दलित परिवार हैं। सवर्णों ने दलितों के बच्चों के साथ अपने बच्चों को पढऩे की इजाजत तो दे दी है, लेकिन उनके परिवार में किसी की मौत के बाद उसे अपने श्मशान में जलाने का अधिकार नहीं दिया है। यहां मुक्तिधाम निजी भूमि पर बना हुआ है, इसलिए इसका खुलकर विरोध नहीं हो रहा है।
ठाकुर-ब्राह्मण बहुल है कनाडि़या
गांव में ज्यादातर ब्राह्मण या ठाकुर हैं। इनमें क्षत्रिय व ब्राह्मण वर्ग के अलग-अलग जाति के लोग निवास करते हैं। करीब 65 प्रतिशत सवर्ण यहां रहते हैं। इसी तरह दलितों में भी अलग-अलग जाति वर्ग के लोग यहां वर्षों से निवास कर रहे हैं। समय के साथ अन्य मान्यताएं तो बदल गई, लेकिन अंतिम संस्कार में हो रहा भेदभाव आज भी इस कुरीति को जिंदा रखे हुए है।