राजेंद्र वाघेला हत्याकांड के फैसले ने पुलिस की कार्रवाई को फिर शंका के घेरे में ला दिया है। पुलिस ने जिन्हें भी आरोपी बनाया, वे न्यायालय में दोषमुक्त साबित हुए। उक्त पूरे मामले में पुलिस की लापरवाही पहले दिन से शुरू हो चुकी थी जब 24 घंटे के भीतर ही आरोपियों को पकडऩे के बाद दो-दो एफआईआर लिखी गई। आश्चर्य की बात यह है कि यह एफआईआर थाने में नहीं, बल्कि थाने के बाहर किसी अन्य कम्प्यूटर पर लिखी गई थी।

इंदौर . (लवीन ओव्हाल) 4 साल पूर्व हुए हत्याकांड के मामले में सभी आरोपी न्यायालय से बरी हो गए हैं। सबूतों और पर्याप्त गवाहों की मौजूदगी में हुई इस हत्या को लेकर पुलिस की लापरवाह कार्यशैली पर से भी पर्दा उठा है। आखिर किन कारणों से सबूतों और गवाह होने के बावजूद भी आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया गया। जब पूरे केस की हकीकत टटोली तो पता चला कि पूरे मामले में एफआईआर की संदिग्धता के बाद पुलिस के बदलते बयानों ने आरोपियों को सबसे ज्यादा फायदा पहुंचाया। जिन पर हत्या का मुकदमा चलाया गया, पुलिस यह भी साबित नहीं कर पाई कि वे मौके पर मौजूद थे और उन्होंने ही हत्या की है। वहीं हत्या के 24 घंटे के भीतर ही प्रथम सूचनाकर्ता के बयानों को बदलने वाली एफआईआर ने भी इस पूरे प्रकरण को और ज्यादा संदिग्ध बना दिया। एफआईआर थाने के अंदर नहीं, बल्कि कहीं और लिखी गई थी। बाद में पुलिस ने इसी फर्जी एफआईआर को ही चालान के साथ न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर दिया।
संदेहास्पद हत्या
पहली एफआईआर के अनुसार, 12 जून 2011 को भाजपा नेता कमल वाघेला का भाई राजेंद्र वाघेला निवासी भागीरथपुरा रात करीब 10.15 बजे रेडीमेड कॉम्प्लेक्स स्थित नीतू अंडेल की दुकान पर पहुंचा था। नीतू राजेंद्र को अपना मुंहबोला भाई बताया था। वह उसके घर पर नाश्ता कर रहा था, तभी विकास पिता जसवंत वर्मा निवासी भगवतीनगर अपने दो साथियों के साथ वहां पहुंचे और राजेंद्र से पूछा कि तेरी इच्छा क्या है और इतने में ही विकास ने चाकू निकाल कर राजेंद्र के पेट में चाकू मार दिया। उसके साथ आए दो साथी भाग गए।
असल एफआईआर
पुलिस ने हत्याकांड के 24 घंटे के भीतर ही आरोपियों को पकड़कर थाने में पेश कर दिया था। उक्त कार्रवाई के साथ ही असल एफआईआर की एक कॉपी भी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई थी। जब आरोपी दीपू के पिता ने अपने बेटे की जमानत के लिए न्यायालय में अर्जी लगाई तो न्यायालय ने पहली एफआईआर के आधार पर ही जमानत देने से इनकार कर दिया था। उक्त एफआईआर की कॉपी ही बाद में असल एफआईआर साबित हुई।
दो-एफआईआर
मामले की जांच कर एसआई पीएस तिलगाम ने स्वीकार किया था कि थाने के कम्प्यूटर के सीपा सिस्टम में फोंट फिक्स होते हैं। वहीं तत्कालीन टीआई आरके सोनकर ने भी अपने बयान में स्वीकार किया था कि दूसरी एफआईआर के फोंट में अंतर है। पूरे मामले की जांच तत्कालीन सीएसपी जयवीरसिंह भदौरिया ने तत्कालीन एसपी, पश्चिम को पूरे मामले की जांच कर रिपोर्ट सौंपी थी। उक्त जांच में बताया गया, रिपोर्ट का कोई भी रिकॉर्ड पुलिस थाना हीरानगर के कम्प्यूटर या कम्प्यूटर के सीपा सिस्टम में नहीं है। इससे साबित हो गया कि दूसरी वाली एफआईआर थाने के बाहर लिखी गई।
गायब तीसरा आरोपी
दो-दो एफआईआर के कारण कई पहलुओं एेसे भी रहे हैं, जो अब तक अनछुए है। पहली और असल एफआईआर में राजेंद्र की मुंहबोली बहन ने जो देहाती नॉलिसी (मौका रिपोर्ट) बनवाई थी उसमें आरोपी विकास के साथ अन्य दो आरोपी होना बताया था। उक्त देहाती नॉलिसी के आधार पर पहली एफआईआर दर्ज भी हुई, लेकिन बाद में चालान के साथ पेश हुई फर्जी एफआईआर में आरोपी विकास के साथ एक अन्य आरोपी को ही शामिल किया।
बाद में दीपू की गिरफ्तारी कर उसे शामिल किया गया। अब सवाल यह उठता है कि जब दूसरी एफआईआर फर्जी थी तो फिर पहली एफआईआर के आधार पर तीसरा आरोपी कौन था और उसे पुलिस ने क्यों बचाया?