
Indore Hindi Language- ओ भिया…' ये दो शब्द कानों में पड़ते ही इंदौर की तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है। पोहे को 'पोये', भैया को 'भिया', स्टेशन को 'टेशन' और 'होगा' को 'हेगा' कहने वाली इंदौरी बोलचाल सिर्फ शब्दों का बदलाव नहीं, बल्कि शहर के मिजाज और मिट्टी की पहचान है। यहां बोलने का अंदाज भी अपना है और शब्दों में अपनापन भी। बोलियां ही भाषा का सौंदर्य हैं। जब तत्सम और मानक शब्दों में देशज शब्द घुलते-मिलते हैं तो भाषा कानों को प्रिय लगने के साथ उसमें आत्मीयता भी भर देते हैं।
इंदौर इसका खूबसूरत उदाहरण है। यहां हिंदी बोलने वालों के साथ निमाड़ी, मालवी, बुंदेली और मराठी भाषी लोग भी बड़ी संख्या में रहते हैं। इन बोलियों और भाषाओं के शब्द जब इंदौर की खड़ी बोली हिंदी में घुलते हैं तो उसकी अपनी एक अलग 'इंदौरी' पहचान बन जाती है। यही वह भाषा है, जिसमें 'भिया' कहने भर से औपचारिकता थोड़ी कम और अपनापन थोड़ा ज्यादा हो जाता है, लेकिन मोबाइल, सोशल मीडिया, हिग्लिश और बदलती युवा पीढ़ी के बीच सवाल है कि इंदौर की हिंदी में बोलियों की यह मिठास कितनी शेष है? क्या नई पीढ़ी इन शब्दों को उसी आत्मीयता से बोल रही है या स्थानीय शब्द धीरे-धीरे बातचीत से बाहर हो रहे हैं? लोक बोलियों का प्रभाव हमेशा से भाषा पर पड़ता रहा है और इंदौर की हिंदी भी इससे अछूती नहीं है।
शहर की आम बोलचाल में मालवी, निमाड़ी और बुंदेली के साथ दूसरी भाषाओं के शब्द भी सहजता से सुनाई देते हैं। 'भैया' का 'भिया', 'होगा' का 'हेगा', 'पोहा' का 'पोये' और 'स्टेशन' का 'टेशन' हो जाना इंदौरी बोलचाल के ऐसे ही रंग हैं। ये शब्द मानक हिंदी से अलग जरूर हैं, लेकिन स्थानीय बातचीत में इनका इस्तेमाल शहर के लहजे और पहचान का हिस्सा बन चुका है। इंदौरियों को अपनी इस खास बोलचाल से खासा प्रेम भी है। बहुभाषी शहर होने के बावजूद इंदौर की हिंदी ने अपनी अलग पहचान कायम रखी है। लोक के शब्दों ने इसमें अपनी जगह बनाकर इसे अधिक सहज, जीवंत और आत्मीय बनाया है।
सोशल मीडिया ने भाषा के सामने एक दिलचस्प स्थिति पैदा की है। इंस्टाग्राम, यूट्यूब और चैटिंग की भाषा ने युवाओं के बीच अंग्रेजी और हिंग्लिश का प्रभाव बढ़ाया है। इंदौर और मालवा से जुड़े रील, मीम और वीडियो में स्थानीय लहजे और शब्दों का इस्तेमाल लोगों को तुरंत शहर और क्षेत्र से जोड़ देता है। 'भिया', 'काय' जैसे स्थानीय रंग वाले शब्द डिजिटल कंटेंट में इस्तेमाल होने पर युवाओं के बीच भी पहुंच रहे हैं।
इंदौरी बोली में 'भिया ओ' जैसे ही ये शब्द कानों में पड़ते हैं, अनजान व्यक्ति भी समझ जाता है कि इंदौर की बात हो रही है। यूं तो इंदौर की कई पहचान हैं, लेकिन शहर की अपनी बोली ने जो पहचान दी है, वह अपने आप में अनूठी है। मालवी भाषी कवि पंकज प्रजापत कहते हैं कि इंदौर की खड़ी बोली में जब मालवी का मीठा तड़का लगता है तो उसकी आत्मीयता और बढ़ जाती है। यही तड़का इंदौरी भाषा को दूसरी जगहों की हिंदी से अलग करता है।
इंदौर की बोलचाल भी बदलाव से गुजर रही है। अब युवाओं की बातचीत में स्थानीय शब्दों के साथ अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल बढ़ा है। 'ओके', 'सीन', 'टाइम', 'फाइनल', 'अपडेट', 'फील', 'प्रॉब्लम' जैसे शब्द सामान्य बातचीत का हिस्सा हैं। कई बार पूरा वाक्य हिंदी का होता है, लेकिन उसमें महत्वपूर्ण शब्द अंग्रेजी के शामिल हो जाते हैं। 'भिया', 'हेगा', 'पोये' जैसे शब्द आज भी इंदौर के बोलचाल के लहजे में सुनाई देते हैं, लेकिन मानक हिंदी व हिंग्लिश का इस्तेमाल बढऩे से इनका रोजमर्रा का प्रयोग कम हो रहा है।
सामान्य बातचीत से हिंदी के कई मानक और संस्कृतनिष्ठ शब्द भी धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। 'आइए' की जगह 'कम ऑन', 'किवाड़' या 'दरवाजा' की जगह 'डोर', 'विश्वविद्यालय' की जगह 'यूनिवर्सिटी' और 'अस्पताल' की जगह 'हॉस्पिटल' जैसे शब्द बातचीत में सहज हो गए हैं। 'विद्यालय' और 'महाविद्यालय' की जगह 'स्कूल' और 'कॉलेज' तथा 'पुस्तकालय' की जगह 'लाइब्रेरी' ज्यादा सहज लगने लगी है। यह बदलाव शहरी जीवन और जरूरतों का हिस्सा है। इसके साथ हिंदी के पारंपरिक शब्दों के इस्तेमाल में कमी भी दिखाई दे रही है।
निमाड़ी साहित्यकार एवं इंफ्लुएंसर पारस बिरला के मुताबिक, इंदौर की बोलचाल पर निमाड़ी का प्रभाव भी साफ दिखाई देता है। निमाड़ी और हिंदी का मेल केवल बातचीत को सहज नहीं बनाता, बल्कि हिंदी के शब्द भंडार और अभिव्यक्ति को भी विस्तार देता है। निमाड़ी बोलने में हिंदी के शब्दों का इस्तेमाल स्वाभाविक रूप से होता है। दोनों के बीच यह मेल हिंदी के लिए नए शब्दों और नई अभिव्यक्तियों के रास्ते खोल रहा है। निमाड़ी छोटी बहन है हिंदी की। निमाड़ी के लोकजीवन, मिट्टी और संस्कृति से निकले शब्द जब हिंदी में आते हैं तो हिंदी अधिक जीवंत, सहज और जनभाषा के करीब बनती है।
भाषाओं की मजबूती बोलियों से है। बोलियां जीवित रहेंगी तो नि:संदेह भाषाएं भी लोक में बची रहेंगी। इस समय हिंदी की संवैधानिक मजबूती भी जरूरी है और जनसामान्य के बीच बोलने-लिखने वालों के माध्यम से सशक्त बनाना भी जरूरी है। समाज को अपने बच्चों को मातृभाषाओं के साथ हिंदी में भी दक्ष करना आवश्यक है।