
Khajrana Ganesh Temple- इंदौर के खजराना गणेश मंदिर में 7 करोड़ के आभूषण बप्पा को पहनाए गए। (फोटो- पत्रिका)
Khajrana Ganesh Temple- मध्यप्रदेश ही नहीं देशभर में गणेश महोत्सव का आज पहला दिन है। सोमवार को धूमधाम से गणेश प्रतिमा स्थापित की जा रही है। इंदौर, उज्जैन, सीहोर के विश्व प्रसिद्ध मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। इंदौर के खजराना गणेश मंदिर में 7 करोड़ के गहनों से बप्पा का आकर्षक श्रृंगार किया गया। वहीं बड़े गणेश मंदिर में भी 101 किलो के लड्डू चढ़ाए गए।
इंदौर के प्रसिद्ध खजराना गणेश मंदिर में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। खजराना गणेश मंदिर में गणेशजी की प्राचीन प्रतिमा का आकर्षक श्रृंगार किया गया। गणेशजी को 7 करोड़ कीमत के स्वर्ण आभूषण पहनाए गए। इससे पहले रविवार को ब्रह्ममुहूर्त में भगवान को हीरे जड़ित नेत्र धारण कराए गए थे।
मुंबई के प्रसिद्ध लाल बाग के राजा का पंडाल और बप्पा का स्वरूप इस बार महादेव (शिव) की थीम पर है। इसके केंद्र में एक विशाल त्रिशूल भी लगाया गया है। जयपुर के मोती डूंगरी गणेश मंदिर में सिंजारा महोत्सव और जन्मोत्सव पर विशेष दर्शन व्यवस्था की गई है। हैदराबाद के खैरताबाद में 72 फीट ऊंची प्रतिमा लाई गई है। इसके अलावा घर-घर मूर्तियां स्थापित करने का सिलसिला देर शाम तक जारी रहा।
इंदौर में बड़ा गणपति मंदिर में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे हैं मंदिर के बाहर बड़ी संख्या में श्रद्धालु कतारों में खड़े हैं। यहां 101 किलो लड्डू का भोग भगवान को लगाया गया। यह मंदिर 125 साल पुराना है। यहां भगवान की प्रतिमा करीब 25 फीट ऊंची है और 14 फीट चौड़ी है। यहां के मुख्य पुजारी पंडित धनेश्वर दाधिच हैं।
इधर, उज्जैन के महाकाल मंदिर में स्थित सिद्धिविनायक मंदिर में भगवान को 5.51 लाख मोदक का भोग लगाया गया। जब भोग लगा तब वहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे। यहां चिंतामन गणेश मंदिर में भी कतारें लगी हैं। यहां पर मंदिर के पीछे यानी मूर्ति की पीठ पर उल्टा स्वास्तिक बनाने की परंपरा है।
सीहोर में प्राचीन चिंतामण गणेश मंदिर में मान्यता है कि यहां उल्टा स्वास्तिक बनाने से बिगड़े काम पूरे हो जाते हैं। बाद में यहां सीधा स्वास्तिक बनाने की परंपरा है। सीहोर के चिंतामन सिद्ध गणेश मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां तपस्वियों को सिद्धी प्राप्त होती है। यहां के गणेशजी की प्रतिमा की आंखों में हीरे जड़े हैं। 150 साल पूर्व तक यह मंदिर ताले में था। चोरों ने मूर्ति की आंखों में लगे हीरे चोरी कर लिए थे। इस मंदिर का निर्माण विक्रम संवत 155 में महाराजा विक्रमादित्य की ओर से कराया गया था। इसके बाद बाजीराव पेशवा प्रथम ने सभा मंडप बनवाया था। बताया जाता है कि विक्रमादित्य काल की यह प्राचीन मूर्ति स्वयं-भू है। यह मंदिर वायव्य पश्चिम-उत्तर कोण पर स्थित है। यह मूर्ति आधी जमीन में धंसी हुई है।
Updated on:
15 Sept 2026 02:28 pm
Published on:
14 Sept 2026 05:51 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
