
इंदौर. शहर की ऐतिहासिक कान्ह नदी के सुंदरीकरण पर पिछले कई वर्षों से करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी निराशाजनक बनी हुई है। नदी आज भी सीवरेज के गंदे पानी, जलकुंभी और कचरे से अटी पड़ी है। नगर निगम समय-समय पर सफाई और पुनर्जीवन के दावे करता है, लेकिन नदी अपने मूल स्वरूप में लौटती नजर नहीं आ रही है। बरसात के दौरान स्थिति और भी गंभीर हो जाती है, जिससे प्रदूषण बढऩे के साथ आसपास के क्षेत्रों में दुर्गंध और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं। इस विषय पर सामाजिक कार्यकर्ता, राष्ट्रीय कवि एवं युवा, शिक्षाविद ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कान्ह नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि इंदौर की प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर है। यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी नदी में सीवरेज का प्रवाह और जलकुंभी की समस्या समाप्त नहीं हो रही है, तो यह योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। उन्होंने कहा कि केवल सफाई अभियान चलाने से समाधान नहीं होगा, बल्कि सीवरेज को पूरी तरह रोकने, नियमित निगरानी और जनभागीदारी के साथ स्थायी पुनर्जीवन योजना लागू करनी होगी। तभी कान्ह नदी अपने पुराने स्वरूप और अस्तित्व को पुन: प्राप्त कर सकेगी।
कान्ह जो खो गई खान में
इंदौर प्रशासन जिस तरह से कान्ह नदी को लेकर चिंतित है उसे देखकर ऐसा लगता नहीं है कि वर्तमान पीढ़ी को यह कान्ह नदी स्वच्छ, सुंदर, कल- कल बहती फिलहाल नजर आएगी। नदी सिर्फ सौंदर्यीकरण नहीं बल्कि स्वच्छता भी चाहती है। प्रशासन शायद यह भूल गया है। इसलिए सिर्फ सौंदर्यीकरण के नाम पर अब तक 1200 करोड रुपए से अधिक कान्ह पर फूंके जा चुके हैं। कान्ह को तो हम अब खान के रूप में खो चुके हैं। समय रहते अगर अब भी ध्यान नहीं दिया गया तो इस नदी का दुष्प्रभाव शिप्रा पर भी दिखने लगेगा। प्रशासन के साथ-साथ शहर की आवाम को भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए इसकी स्वच्छता पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि जल है तो कल है।
-डॉ.वंदना जोशी, प्रोफेसेर
कान्ह नदी में डूबता धन, व्याकुल जन-मन...
विकास के नाम पर कब तक होगा धन का अवमूल्यन? कान्हा नदी की सफाई के नाम पर वर्षों से योजनाएँ बहती रहीं, बजट बहता रहा, लेकिन नदी का पानी नहीं बदला। हर बरसात में वही गंदगी, वही दुर्गंध और वही सवाल.......आखिर करोड़ों रुपये गए कहां? जनता पूछ रही है यदि धन नदी में बहाने के बाद भी नदी की दशा नहीं सुधरी, तो यह विकास है या केवल कागज़ी प्रयास? योजनाएं बनती हैं, घोषणाएं होती हैं, शिलान्यास होते हैं, लेकिन परिणाम दिखाई नहीं देते। नदी तभी बचेगी जब नीयत साफ़ होगी । केवल सीमेंट और कंक्रीट से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और जनभागीदारी से नदी का पुनर्जीवन होगा। कान्ह नदी में डूबता धन, व्याकुल है जन- मन ,
हिसाब मांगता आज शहर , कहां गया वह सार्वजनिक धन?
पुनर्जीवन की राह तकती, आज खड़ी है कान्ह ।
कब जागेगा उत्तरदायित्व, कब बदलेगी पहचान?
वादों से नहीं, कर्मों से ही बहती निर्मल धार।
नदी बचेगी तभी बचेगा, सुन्दर शहर व संसार ।
-डॉ. श्याम सुन्दर पलोड, राष्ट्रीय कवि
नदी से नाला बन गई अपनी इंदौरी कान्ह ...
शहर के जिम्मेदार अब तो जागो, बचा लो इसकी मिटती पहचान। कभी कल-कल बहती धारा थी, आज गंदगी की मार है। विकास की दौड़ में अपनी कान्ह नदी उपेक्षा की शिकार है। करोड़ों की योजनाएं आईं, अनेक दावे हुए ,लेकिन नदी आज भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। नदी का पुनर्जीवन केवल सरकारी परियोजना नहीं, बल्कि पूरे शहर का नैतिक दायित्व है। जिस दिन कान्ह फिर से निर्मल बहेगी, उसी दिन इंदौर का पर्यावरण और गौरव दोनों नए शिखर पर होंगे। जब तक जल की लाज नहीं , तब तक कैसा विकास, कान्ह बचेगी, तभी बचेगा इंदौर का विश्वास ।
-डॉ. विमल शर्मा, शिक्षाविद
पुनर्जीवन की राह तकती कान्ह नदी