
इंदौर. सियासत के रंग भी अजीब है। कभी जिन लोगों के एक इशारे पर बड़े-बड़े बदलाव हो जाते थे, अब वे ही सियासत के नए तौर-तरीकों के बीच पनाह मांगते नजर आते हैं। इंदौर के कई दिग्गज नेता ऐसे हैं, जो कभी पूरे प्रदेश के टिकट तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, लेकिन अब उन्हें उन नेताओं के भरोसे रहना पड़ रहा है जिन्हें कभी राजनीति में सहारा दिया था।
महेश जोशी : कांग्रेस
संजय गांधी की कोर टीम में शामिल रहे महेश जोशी 90 के दशक तक कांग्रेस में प्रदेश के बड़े नेताओं में शुमार रहे। संयुक्त मध्यप्रदेश की 320 सीटों पर कांग्रेस के टिकट वितरण में उनका खासा दखल था। अर्जुनसिंह के मंत्रिमंडल में बतौर मंत्री जोशी इंदौर, धार, उज्जैन, मंदसौर, रतलाम, झाबुआ सहित टीकमगढ़ तक टिकट दिलाने में अहम भूमिका निभाते थे। दिग्विजयसिंह को कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष बनवाने और उनकी राजनीति में जोशी की अहम भूमिका रही और दिग्विजयसिंह मालवा की राजनीति में सबसे अहम किरदार बने। वर्तमान में उन्हें अपने ही बेटे के एक टिकट के लिए संघर्ष करना पड़ा और निराशा ही हाथ लगी। जोशी लगभग 25 दिनों से दिल्ली में ही जमे हैं, इस दौरान कांग्रेस के बड़े नेताओं से लेकर वे सभी के संपंर्क में रहे। उसके बाद भी उनके बेटे का टिकट नहीं हो पाया।
रामेश्वर पटेल: कांग्रेस
इंदौर के ग्रामीण क्षेत्र और सहकारिता की राजनीति में सबसे अहम किरदारों में से एक रहे रामेश्वर पटेल अर्जुनसिंह के मुख्य सिपाहसालारों में शामिल थे। पटेल इंदौर और आसपास के जिलों की ग्रामीण सीटों पर सीधा दखल रखते थे। उनकी राय अर्जुनसिंह के लिए खासी अहमियत रखती थी। वे ही चुनावों में टिकटों के वितरण के चयन के समय नेताओं की स्थिति की जानकारी अर्जुन सिंह को देते थे। अर्जुनसिंह के करीबी रहते वे न सिर्फ देपालपुर से विधायक रहे, बल्कि प्रदेश में काबीना मंत्री भी बने। यही नहीं लोकसभा का टिकट भी उन्हें दिया गया। वहीं उनके बेटे सत्यनारायण पटेल को भी पार्टी ने चार बार विधानसभा और दो बार लोकसभा का टिकट दिया। जिसमें दो बार वे विधायक भी बने। वहीं इस बार उन्हें अपने बेटे के टिकट के लिए परेशान होना पड़ रहा है। वे एक टिकट के लिए परेशान हो रहे हैं।
सत्यनारायण सत्तन : भाजपा
प्रदेश में भाजपा का विधानसभा में खाता खोलने वालों में सत्यनारायण सत्तन शामिल रहे हैं। एक समय था कि मल्हारगंज में उनके ठिए पर पूरे प्रदेश की टिकट की बात चलती थी लेकिन इस समय सत्तन पूरी तरह से अकेले हैं। 1983 में उपचुनाव के दौरान सत्तन ने भाजपा का खाता खोला था। पार्टी में अटल-अडवाणी नेतृत्व के दौरान सत्तन की तूती बोलती थी। वे चुनाव लड़े तो उनके प्रचार के लिए अटल बिहारी वाजपेयी को आना पड़ा था। भाजपा में शीर्ष पर कोई भी नेता हो लेकिन सत्तन को नाराज करने की किसी की हिम्मत नहीं होती थी। समय बीता, अब स्थिति यह है कि सत्तन का ठिया वीरान है, स्थिति यह है कि गाहे बगाहे पार्टी ही उनके निशाने पर आ जाती है। पहले जहां नेताओं का जमघट होता था, प्रदेश के मुखिया आते-जाते थे। मोहल्ला रोशन रहता था. वहां से अब कोई असरदार व्यक्ति नजर नहीं आता है। समय बदलता तो अब खुद या अपने किसी नजदीकी के लिए टिकट की पैरवी करना भी छोड़ दी है।
कृष्णमुरारी मोघे : भाजपा
प्रदेश भाजपा के कद्दावर नेताओं में कृष्णमुरारी मोघे का नाम शामिल है। संघ के प्रचारक रहे मोघे का इंदौर ही नहीं प्रदेश में दबदबा है और राष्ट्रीय नेता तक उनसे प्रभावित रहते हैं। प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री की जिम्मेदारी सालों संभालने वाले मोघे प्रदेश में होने वाले चुनावों केदौरान टिकट वितरण में मुख्य भूमिका निभाते रहेे। खरगोन से 2004 से 2009 तक सांसद रहे मोघे को 2009 में इंदौर से महापौर चयन की जिम्मेदारी मिली और जब स्थानीय नेताओं में उम्मीदवार को लेकर एक राय नहीं बनी तो विरोध को दबाने के लिए पार्टी ने मोघे को ही उम्मीदवार बना दिया। हालांकि मोघे को उम्मीदवार बनाए जाने से स्थानीय स्तर पर पार्टी में असंतोष तो उभरा, लेकिन उनके दबदबे के कारण किसी ने उसे जाहिर नहीं किया और वे आसानी से चुनाव जीत भी गए। एक समय था कि जब मोघे के सामने बड़े-बड़े नेता भी कुछ बोल नहीं पाते थे, लेकिन अब स्थिति काफी बदल गई है। महापौर रहते हुए भाई गुट से जुड़े कई एमआइसी सदस्य सार्वजनिक रूप से उनका विरोध करने से बाज नहीं आए। अब स्थिति यह है कि मोघे चयन समिति में जरूर हैं, पर पहले वाला रसूख कहीं नजर नहीं आ रहा है। इस बार मोघे खरगोन से खुद के लिए टिकट की चाह रख रहे थे, लेकिन उनके नाम को लेकर एक राय बनती नजर नहीं आई। इंदौर में उनके समर्थक मधु वर्मा राऊ से दावेदारी जता जरूर रहे हैं, लेकिन उन्हें भी मोघे से वह मदद नहीं मिल रही है, जिसकी वे उम्मीद कर रहे थे। वे दौड़ में पिछड़ते नजर आ रहे हैं। मोघे के नेतृत्व में काम कर चुके कैलाश विजयवर्गीय व अन्य नेता टिकट को लेकर उन्हें कड़ी टक्कर दे रहे हैं। समर्थक मानते है कि एक समय मोघे के सामने नेताओं की जुबान नहीं खुल पाती थी और अब वहीं मोघे खुद के टिकट के लिए भी पार्टी का राजी नहीं कर पा रहे हैं।