
MP High Court on water contamination case bhagirathpura: इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में जारी दूषित पानी से जिंदगियां दांव पर लग गईं। मामला अब हाईकोर्ट तक पहुंच गया है। सुनवाई जारी है। उच्च न्यायालय ने सरकार और नगर निगम दोनों पर जवाबदेही, कर्तव्यनिष्ठा और लोगों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बता दें कि इंदौर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रितेश इनानी ने पानी की खराब गुणवत्ता और उससे होने वाली बीमारियों को लेकर सार्वजनिक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की है।
मध्य प्रदेश सरकार ने कोर्ट में रिपोर्ट में बताया है कि भागीरथपुरा में दूषित पानी के कारण सिर्फ 4 मौतें हुईं और 294 लोग बीमार हुए। इनमें 32 गंभीर हालत में ICU में हैं। कोर्ट ने इस रिपोर्ट को रिकॉर्ड में लिया और पूछताछ जारी रखी।
याचिकाकर्ताओं ने मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का अनुरोध किया, लेकिन कोर्ट ने फिलहाल इसे ठुकरा दिया। दरअसल कोर्ट भी चाहता है कि ऐसा न करने से पब्लिक और मीडिया की निगरानी जारी रहेगी।
स्वास्थ्य अधिकारियों की रिपोर्ट में 4-7 मौतें, लेकिन स्थानीय स्वास्थ्य सर्वे और अस्पताल रिकॉर्ड के मुताबिक मृतकों की संख्या 15-17 से भी अधिक बताई जा रही है।
प्रभावित इलाके के रहवासियों का कहना है कि उन्होंने कई महीनों से खराब पानी की शिकायतें की हैं, लेकिन प्रशासन ने समय रहते कोई कार्रवाई नहीं की, इससे लोग गंभीर रूप से बीमार हुए और कई मौत की नींद सो गए।
बताया जा रहा है कि स्वास्थ्य टीमों ने 9,000 से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग की, जिनमें से कई का अस्पतालों में इलाज जारी है और कुछ की हालत गंभीर बनी हुई है।
भागीरथपुरा से लिए गए पानी के सैंपल में बैक्टीरिया मौजूद पाए गए हैं, जिससे संक्रमण फैलने की आशंका बढ़ गई है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि यह मामला सिर्फ पीड़ितों के इलाज तक सीमित नहीं रहा। न्यायालय अब सरकारी योजना, जल आपूर्ति को लेकर जवाबदेही, आपदा प्रबंधन नीति, अस्पतालों की तैयारी और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने को लेकर किए जाने वाले प्रयासों पर सवाल पूछ रहा है। कोर्ट कि चिंता साफ है कि क्यो लोगों को साफ पानी देना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है? अगर प्रशासन विफल रहा है, तो उसकी जवाबदेही तय क्यों नहीं? साथ ही ये भी कि क्या ऐसी आपदाओं को दुर्घटना कहकर छोड़ा जा सकता है?
कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अगर सरकार साफ, सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने में विफल रही, तो इसके लिए न्यायिक निगरानी या जांच और अधिकारियों को व्यक्तिगत तौर पर जवाब देना पड़ सकता है। हाई कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि अगर साफ पानी भी सुरक्षित नहीं तो सिस्टम किस काम का है?
हाई कोर्टइंदौर ने स्पष्ट किया है कि जनता का जीवन और स्वास्थ्य सर्वोपरि है और अगर सरकारी तंत्र इसके लिए असमर्थ या अनुत्तरदायी साबित होता है, तो न्यायालय कानूनी कार्रवाइयों का मार्ग सम्भवतः लागू कर सकता है।