
(इंदौर से भूपेंद्र सिंह की रिपोर्ट)
Chhatron Ki Goonj Indore: भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बाद शहर में राहुल गांधी के छात्रों की गूंज के कार्यक्रम से इंदौर शहर एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर है। शहर ने भाजपा कांग्रेस के बड़े नेताओं को आते-जाते ही नहीं देखा, बल्कि राजनीति की बदलती भाषा और बदलते मुद्दों को भी महसूस किया है। एक दौर था जब दोनों दलों के बड़े नेता बड़ी सभाओं में राष्ट्रीय मुद्दों पर जनता को संबोधित करते थे। फिर राजनीति में संगठन और विचारधारा का दौर मजबूत हुआ। इसके बाद विकास, शहर, स्वच्छता और बुनियादी सुविधाएं - चुनावी संवाद का हिस्सा बनीं।
अब भाजपा-कांग्रेस की राजनीति का नया मंच जेन-जी से संवाद का है। नेताओं के लंबे भाषण और औपचारिक मंच के बजाय युवाओं तक पहुंचने के तरीके भी बदल रहे है। इंदौर में राहुल गांधी के छात्रों की गूंज से पहले कांग्रेस ने कॉलेज, कैफे, लाइब्रेरी और हॉस्टल में छात्रों से संपर्क किया। जेमिंग सेशन, क्रिकेट, जींस-टीशर्ट में अनौपचारिक मुलाकात, ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन और सीधे सवाल-जवाब इसके नए तरीके है। भाजपा भी जेनजी के लिए वन-वे मैसेजिंग से टू-वे संवाद की ओर बढ़ चुकी है। विश्वविद्यालयों में सीधे संवाद, सोशल मीडिया पर इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म और युवा टीमों के जरिए संपर्क बढ़ाया जा रहा है। जुलाई में दिल्ली भाजपा ने 'युवा संवाद' में छात्रों से सीधे बातचीत भी की।
शहर की राजनीति की शुरुआत राजबाड़ा की विशाल सभाओं से हुई। फिर चुनावी मंचों के साथ निवेश सम्मेलन और विकास कार्यक्रम जुड़े। सोशल मीडिया और रोड शो ने नेता को मंच से सड़क तक पहुंचाया। यानी इंदौर में सिर्फ नेता नहीं बदले, राजनीति का तरीका भी बदला है- नेता बोले, जनता सुने' से 'जनता बोले, नेता सुने तक। इंदिरा-राजीव के दौर में नेता बोलता था और भीड़ सुनती थी।
इंदिरा दौर में राजनीतिक संवाद का सबसे बड़ा माध्यम विशाल जनसभाएं और नेता का सीधा भाषण हुआ करता था। इसे लेकर इंदिरा भी इंदौर पहुंची।
1991 में राजीव गांधी ने इंदौर के राजबाड़ा क्षेत्र में आमसभा को संबोधित किया था। इसमें तकनीक मुख्य मुद्दा रही।
भाजपा के विस्तार के दौर में इंदौर ने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं की सभाएं देखीं। फरवरी 1983 में अटल ने राजबाड़ा पर नगर निगम चुनाव के दौरान भाजपा के पक्ष में सभा को संबोधित किया था। बाद में 1999 में भी वे लोकसभा चुनाव के सिलसिले में इंदौर आए और जनसभा की। इस दौर में राजनीतिक संवाद का एक बड़ा माध्यम था बड़ी सभा, भाषण और विचारधारा। 2012 में आडवाणी इंदौर के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में पहुंचे। यहां राजनीतिक भाषण का फोकस चुनावी सभा से अलग था-निवेश, उद्योग और रोजगार। यानी राजनीति के साथ आर्थिक विकास का मुद्दा भी मंच पर आ गया।
2023 प्रवासी भारतीय दिवस और 2025 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी धार के लिए इंदौर आए तो मंच का मुद्दा बदल चुका था। शहरी विकास, स्वच्छता, आवास, पानी, परिवहन और कचरा प्रबंधन जैसे विषय सामने थे। यहां राजनीति सिर्फ 'देश कैसा होना चाहिए तक सीमित नहीं थी, बल्कि 'शहर कैसा दिखना चाहिए और सरकार क्या सुविधा दे रही है' तक
पहुंच चुकी थी। दोनों पार्टियां मंच से सड़क तकः 2018 में अमित शाह ने राजबाड़ा से भाजपा का महासंपर्क अभियान शुरू किया। 2023 में नरेन्द्र मोदी खुले वाहन में लोगों के बीच पहुंचे। यह राजनीति के तरीके में भी बदलाव था। प्रियंका गांधी ने भी 2018 में रोड शो किया।
नवंबर 2022 में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा इंदौर-महू क्षेत्र से गुजरी। प्रियंका गांधी भी 24 नवंबर को इंदौर पहुंचीं और यात्रा में राहुल गांधी के साथ शामिल हुईं। राहुल के इस अभियान का संदेश देश को जोड़ने, संविधान और सामाजिक संवाद पर केंद्रित था। अब 2026 में 'छात्रों की गूंज का मंच है।