प्रदेश में किसानों की बेहतर स्थिति के लिए सरकार को भले ही चार साल से कृषि कर्मण्य अवॉर्ड मिल रहा है, लेकिन वास्तव में स्थिति इसके उलट है। धार जिले के पीथमपुर के आसपास के 1000 से अधिक किसान अपनी जमीन के मुआवजे के लिए 8 साल से संघर्ष कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सितंबर 2015 में दिए गए आदेश के मुताबिक राज्य सरकार को 1800 करोड़ का मुआवजा चार महीने में देना था, लेकिन अब तक पैसा नहीं मिला है।
में ऑटो टेस्टिंग टै्रक के लिए सरकार ने 16 मई 2007 से जमीन अधिगृहण की कार्रवाई शुरू की। 1080 हेक्टेयर सिंचित भूमि अधिगृहीत की गई। किसानों की ओर से याचिका दायर करने वाले एडवोकेट रामनारायण धाकड़ के मुताबिक, उस समय सरकार बहुमूल्य जमीन लेकर किसानों को बहुत कम मुआवजा दे रही थी। लंबे समय तक वह राशि भी नहीं मिलने पर किसानों ने जिला कोर्ट में परिवाद दायर किया और प्रति हेक्टेयर 1.50 करोड़ रुपए की मांग की। जिला कोर्ट ने 48 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर के हिसाब से मुआवजा देने का फैसला सुनाया था।
फैसले के खिलाफ किसानों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। हाई कोर्ट ने मुआवजा 96 लाख रुपए हेक्टेयर करने के आदेश दिए। इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने सिंचित भूमि के लिए 60 लाख रुपए हेक्टेयर एवं असिंचित भूमि के लिए 45 लाख रुपए हेक्टेयर के हिसाब से मुआवजा देने का आदेश दिया।
खंडवा के किसान बद्रीलाल चौधरी ने बताया, मेरी और परिवार की 55 बीघा जमीन अधिगृहीत की थी। जमीन लेते समय तो बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन 8 साल से हम पैसों के लिए तरस रहे हैं। कोर्ट से भी केस जीतने के बाद भी सरकार पैसे नहीं दे रही है।
खंडवा के ही विष्णु रामेश्वर कामदार का कहना है, 18 बीघा सिंचित भूमि दे चुके हैं। प्रदेश सरकार खुद को किसानों की रक्षक बताती है, लेकिन वास्तव में वह भक्षक बन चुकी है। हक का मुआवजा नहीं दिया जा रहा है।
धार जिले के गोद गांव के माखनलाल चौधरी का कहना है, 10 बीघा जमीन दी है। पैसा नहीं देने से सरकार की मुश्किलें और बढ़ जाएगी। निर्धारित अवधि में पैसा नहीं दिया तो नियमों के मुताबिक 15 प्रतिशत की दर से ब्याज देना होगा।