इंदौर

खाड़ी देशों में फंसे 2000 कंटेनर, खाने वाली चीजों में लगा ‘महंगाई’ का तड़का

US-Israel-Iran War: मालवा के निर्यातक नए ऑर्डर लेने में सावधानी बरत रहे हैं, क्योंकि उन्हें समय पर डिलीवरी और पेमेंट को लेकर अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है।

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Apr 09, 2026
Food Items (Photo Source - Patrika)

US-Israel-Iran War:मप्र के मालवा क्षेत्र से सोयाबीन, गेहूं और मसालों का बड़े पैमाने पर निर्यात होता है, लेकिन ईरान-इजरायल-अमरीका युद्ध ने पूरी सप्लाय चेन को प्रभावित किया है। निर्यातकों के पेमेंट विदेशों में अटक गए हैं और असर किसानों तक पहुंच रहा है। वैश्विक संकट मालवा की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। एक्सपर्टस की मानें तो आने वाले दिनों में मालवा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था 50 प्रतिशत तक प्रभावित हो सकती है। प्रदेश की जीडीपी में 40 से 50 हजार करोड़ की हिस्सेदारी मालवा क्षेत्र की है। मिडिल ईस्ट का संकट वैश्विक खाद्य संकट में बदल रहा है। इसकी तपिश रसोई तक पहुंच गई है। युद्ध के चलते पश्चिम एशिया और रेड सी क्षेत्र में समुद्री मार्ग असुरक्षित होने से जहाज कंपनियां लंबा रास्ता चुन रही हैं।

इससे माल पहुंचने में देरी के साथ भाड़ा (फ्रेट) और बीमा लागत काफी बढ़ गई है। ऐसे में मालवा के निर्यातक नए ऑर्डर लेने में सावधानी बरत रहे हैं, क्योंकि उन्हें समय पर डिलीवरी और पेमेंट को लेकर अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। स्थिति पूरी तरह पेमेंट क्राइसिस वाली नहीं है, लेकिन जोखिम बढ़ा है। पश्चिम एशिया के कुछ खरीदारों ने नए ऑर्डर टाल दिए हैं। कुछ मामलों में शिपमेंट में देरी के कारण पेमेंट लेट हो रहे हैं। क्रेडिट (उधार) पर होने वाले सौदों में भरोसा घटा है। इससे निर्यातकों का कैश फ्लो प्रभावित हो रहा है।

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मालवा के उद्योगों पर दबाव

मालवा की अर्थव्यवस्था में सोयाबीन की अहम भूमिका है। सोया मील का निर्यात मुख्य रूप से एशियाई और यूरोपीय देशों में होता है, जो अब लॉजिस्टिक समस्याओं से प्रभावित है। मप्र के किसानों के लिए इस बार गेहूं बेच पाना आसान नहीं है। खेतों में फसल कटकर रखी है, लेकिन बार-बार खरीदी टलने से किसान चिंतित हैं। गेहूं खरीदी में देरी की बड़ी वजह बारदाने की कमी है। ये बैग पेट्रोलियम उत्पादों से बनते हैं और सप्लाय प्रभावित होने से इनका उत्पादन कम हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस साल बड़ी संख्या में बारदाने की जरूरत है, लेकिन उपलब्धता बहुत कम होने से खरीदी अटक गई है।

रसोई में महंगाई

युद्ध और रास्ता बंद होने से कच्चे तेल की कीमतें 115 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। जहाजों को लंबे रास्तों से भेजने से माल ढुलाई 18 प्रतिशत तक महंगी हुई है। कच्चे तेल के महंगे होने से खेतों में ट्रैक्टर चलाने, सिंचाई करने और मंडियों तक अनाज पहुंचाने का खर्च बढ़ गया है। इसका असर महंगाई पर पड़ा है।

इंदौर में सोयाबीन तेल का 13 किलो का डिब्बा 500 रुपए महंगा होकर 2500 रुपए, मूंगफली तेल 2800 रुपए प्रति डिब्बा और सरसों तेल 2750 रुपए प्रति डिब्बा बिक रहा है। ट्रांसपोर्ट महंगा होने से गेहूं का भाव 3100 से 3300 रुपए प्रति क्विंटल हो गया है। चना दाल 100, तुवर दाल 145, उड़द मोगर 140, मूंग दाल 130, काबली चना 110 से 120, चावल बासमती 90, सोयाबीन 60 और मक्का 20 रुपए प्रति किलो बिक रही है। चावल में 15 रुपए तो पैकिंग थैलियों में 80 रुपए प्रति किलो का बड़ा उछाल आया है।

अर्थव्यवस्था 50% प्रभावित

मालवा के निर्यात पर असर

मालवा क्षेत्र से केला, अंगूर, आम, लहसुन, दालें व काबली चने का निर्यात खाड़ी देशों को होता है। काबली चना तो करीब 60 प्रतिशत जाता है। यदि युद्ध लंबा चलता है तो मालवा क्षेत्र की सप्लाय चेन ठप हो जाएगी। -प्रकाश व्योहरा, पल्सेस कारोबारी

खाद की किल्लत बढ़ेगी

खाद की कीमत दोगुनी होगी या बाजार में नहीं मिलेगी तो किसान इस्तेमाल कम करेंगे। इसका असर फसलों की पैदावार पर पड़ेगा। सोयाबीन निर्यात पहले ही कम हो चुका है और आने वाले दिनों में यह और प्रभावित हो सकता है। -डीएन पाठक, अधिकारी, सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया

2000 कंटेनर फंसे

खाड़ी देशों में करीब 2000 कंटेनर फंसे हैं। इससे मालवा पर आर्थिक संकट छाने लगा है। गेहूं और चावल की पैदावार कम होगी तो कीमतें बढ़ेंगी। युद्ध से वैश्विक खाद्य आपूर्ति दबाव में थी। अब नए संकट ने सिस्टम को ढहने की कगार पर ला दिया है। -रमेश खंडेलवाल, अध्यक्ष, अहिल्या चैंबर्स ऑफ कॉमर्स इंडस्ट्रीज

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Updated on:
09 Apr 2026 12:31 pm
Published on:
09 Apr 2026 12:29 pm
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