
Indore news: पिता की बीमारी ने परिवार को अपना शहर छोड़कर दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों के अस्पतालों तक पहुंचा दिया था। इलाज की उम्मीद थी, लेकिन उससे बड़ी चिंता थी कि लिवर ट्रांसप्लांट के लिए डोनर कब मिलेगा। महीनों तक अस्पतालों के चक्कर, भर्ती और इलाज के बाद भी परिवार के सामने कोई रास्ता साफ नहीं था।
इसी बीच एक फोन कॉल ने पूरी तस्वीर बदल दी। इंदौर में लिवर उपलब्ध हुआ और महालक्ष्मी नगर निवासी वीरेंद्र जैन का ट्रांसप्लांट हो गया। सबसे खास बात यह रही कि जहां बड़े शहरों के अस्पतालों में लंबे समय तक भर्ती रहने की बात कही गई थी, वहीं इंदौर में ट्रांसप्लांट के करीब दो सप्ताह बाद ही वे घर लौट आए। आज वे स्वस्थ हैं और सामान्य जीवन जी रहे हैं।
वीरेंद्र जैन के बेटे प्रतीक ने बताया कि पिता का लिवर खराब होने के बाद डॉक्टरों ने ट्रांसप्लांट की सलाह दी थी। कई अस्पतालों में इलाज भी कराया, लेकिन सुधार नहीं हुआ। इसी दौरान परिवार ने लिवर डोनेशन के लिए अपना नाम पंजीकृत कराया और डोनर का इंतजार करने लगे। अस्पताल से फोन आया कि लिवर उपलब्ध हुआ है और उनके पिता का ट्रांसप्लांट किया जा सकता है। परिवार तुरंत अस्पताल पहुंचा और ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया शुरू हुई। चर्चा में बताया कि पिता को जब नई जिंदगी मिली तो अंगदान का महत्व समझ में आया। हमने भी तय किया है कि अंगदान किया जाएगा ताकि मौत से संघर्ष करने वाले को नई जिंदगी मिल सके।
प्रतीक के मुताबिक बड़े अस्पतालों में इलाज का खर्च करीब एक से डेढ़ करोड़ रुपए तक बताया गया था। इसके अलावा पिता को लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रखने की बात कही गई थी। परिवार के सामने इलाज के साथ अनजान शहर में रहने और पिता की देखभाल के लिए परिजनों के रुकने का खर्च भी था। मिडिल क्लास परिवार के लिए यह सब जुटाना आसान नहीं था।
हालांकि परिवार ने किसी तरह इंतजाम करने की तैयारी कर ली थी, लेकिन इंदौर में ही ट्रांसप्लांट की सुविधा और डोनर मिलने से सबसे बड़ी चिंता दूर हो गई। ट्रांसप्लांट के बाद वीरेंद्र जैन करीब दो सप्ताह में डिस्चार्ज होकर घर लौट आए। परिवार के लिए यह सिर्फ सफल ऑपरेशन नहीं था, बल्कि अपने ही शहर में जिंदगी को दोबारा पाने जैसा अनुभव था। आज वे स्वस्थ हैं और सामान्य दिनचर्या जी रहे हैं।