
इंदौर .योग और संगीत दोनों प्राचीन विद्याएं हैं और दोनों दिल और दिमाग पर असर करती हैं। इन दोनों में जो आंतरिक संबंध है उस संबंध में पत्रिका ने शहर के कुछ संगीत कलाकारों से बात की। शास्त्रीय गायक गौतम काले ने कहा कि संगीत और योग दोनों अध्यात्म और मन की शुद्धि की ओर ले जाते हैं। दोनों प्रकृति से जुड़े हैं। दोनों में सांस की लय और सांस की गति है। संगीत में ध्वनि है और ओंकार ध्वनि योग का तत्व है। गायन हो या वादन जहां भी सांस का काम है वहां योग है ही।
प्राणायाम और योग है बांसुरी वादन
बांसुरीवादक हर्षवर्धन लिखिते कहते हैं कि बांसुरी एक फूंक वाद्य है जो सांस के उतार-चढ़ाव पर ही आधारित है। बांसुरी बजाते समय योग की तरह गहरी सांस अंदर लेना होती है और फिर उसे धीरे-धीरे छोड़ा जाता है। सांस की लय ही संगीत पैदा करती है। ये भी योग का एक स्वरूप है। बांसुरी बजाने पर मैं भी उसी तरह तरोताजा महसूस करता हूं जिस तरह कोई योग साधक महसूस करता है। सुबह प्राणायाम के बाद ही बांसुरी का रियाज शुरू करता हूं और इसके जरिए मैंने अपने वादन में फर्क महसूस किया।
बीमारियां खत्म करता है संगीत
शास्त्रीय गायिका डॉ. छाया मटंगे कुछ वर्ष पूर्व खुद कैंसर से पीडि़त हुईं तो उन्हें संगीत की शक्ति का पता लगा। उन्होंने इस विषय का अध्ययन किया तब से एक संस्था भी बनाई इंद्रधनुष संगीत उपचार संस्था। इसके जरिए वे कैंसर पीडि़त मरीजों को संगीत के जरिए राहत पहुंचाने का काम कर रही हैं। उन्होंने बताया कि हर राग का अपना गुण होता है और अलग-अलग राग अलग बीमारियों में फायदेमंद होता है। हृदय की बीमारियों के लिए राग यमन, भूपाली दुर्गा और भीमपलासी राग फायदेमंद हैं। जरूरी नहीं है कि शुद्ध राग ही सुने जाएं। रागों पर आधारित फिल्मी गीत या भजन भी सुन सकते हैं।