भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआर्इ) ने फिनटेक फर्म्स काे निर्देश दिया था कि ये कंपनियां भारतीय लोगों से संबंधित सभी डेटा को देश में ही स्टोर करें। आरबीआर्इ ने ये निर्देश गत अप्रैल में दिया था जिसके लिए इन कंपनियों को 6 महीने का माेहलत दिया गया था।
नर्इ दिल्ली। फेसबुक डेटी लीक प्रकरण के बाद अाम लोगों का डेटा सुरक्षा अब वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा सवाल बन गया है। बीते कुछ समय में भारत में भी इसको लेकर कर्इ सवाल खड़े हुए है। देश के सर्वोच्च न्यायालय में अाम लोगों के आधार डेटा को लेकर कर्इ याचिकाएं दायर की गर्इ। कर्इ मामलों पर अभी सुनवार्इ चल भी रही है। इस समय दुनियाभर में डेटा लोकलाइजेशन अौर उसको लेकर नए नियम दुनियाभर में बहस का मुद्धा बना हुआ। दूसरी तरफ इस क्षेत्र की कर्इ कंपनियां अभी भी ढोलमोल रवैया अपना रही हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआर्इ) ने फिनटेक फर्म्स काे निर्देश दिया था कि ये कंपनियां भारतीय लोगों से संबंधित सभी डेटा को देश में ही स्टोर करें। आरबीआर्इ ने ये निर्देश गत अप्रैल में दिया था जिसके लिए इन कंपनियों को 6 महीने का माेहलत दिया गया था। बीते 15 अक्टूबर को इसकी मियाद पूरी हो चुकी है। इन कंपनियाें ने आरबीआर्इ के सामने कुछ प्रस्ताव रखने के साथ-साथ लोकल सर्वर के लिए कुछ आैर समय भी मांगा था। आरबीआर्इ ने इन कंपनियों को प्रस्ताव को पूरी तरह से नकारते हुए कहा है कि डेटा स्थानीयकरण को लेकर समय-सीमा नहीं बढ़ाया जाएगा।
बढ़ती डिजिटल आबादी के साथ तेजी से बढ़ रहा भारत में इंटरनेट डेटा
मौजूदा समय में भारत में हर रोज एक बड़े स्तर पर आम लोगों द्वारा इंटरनेट डेटा जेनरेट होता है। एक रियल एस्टेट एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में डिजिटल आबादी को देखते हुए कहा जा सकता है कि हमें डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर की सख्त जरूरत है। साल 2010 में भारत में डिजिटल डेटा करीब 40 हजार पेटाबाइट्स था। जो कि साल 2020 में करीब 25 लाख पेटाबाइट्स हो जाएगा। सबसे खास बात ये है कि पूरी दुनिया की तुलना में इसमें ढार्इ गुना बढ़ोतरी होगी। यदि भारत इन डेटा का लोकलाइजेशन करता है तो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा डेटा सेंटर बन जाएगा। इसके साथ ही साल 2050 तक भारत विश्व का पांचवा सबसे बड़ा डेटा सेंटर मार्केट बन जाएगा।
नाखुश है आर्इटी कंपनियां
दुनियाभर की कर्इ बड़ी आर्इटी कंपनियां जो भारत में काम करती हैं, वो इतने कड़े नियमों को लेकर नाखुश दिखार्इ दे रही हैं। हाल ही में गूगल के प्राइवेसी चीफ कीथ एनराइट ने अपने एक ब्लाॅग में कहा कि माॅडर्न इकोनाॅमी के लिए क्राॅस बार्डर डेटा फ्लो का मैकेनिज्म बहुत ही महत्वपूर्ण है। दुनियाभर के देशों को प्रावेसी रेग्युलेशन को लेकर इंटीग्रेटेड फ्रेमवर्क को अपनाना चाहिए। सरकार व नियामकों के लिए सबसे बड़ी चिंता डेटा सुरक्षा के साथ-साथ देसी वेंचर की सुरक्षा को लेकर भी है। पेटीएम व फोनपे जैसी कंपनियां पहले से ही डेटा लोकलाइजेशन के पक्ष में खड़ी हैं।
कंपनियों के लिए खर्च बढ़ना है समस्या
कंपनियां विभिन्न भौगोलिक जगहों से डेटा स्टोर, प्रोसेसिंग आैर उसे एनलाइज करना चाहती हैं। कुछ कंपनिया व वकीलों का यह भी कहना है कि ये दांव कर्इ देशों के लिए उल्टा भी पड़ सकता है। पहली बात तो ये कि इससे कंपनियों की लागत बढ़ेगी। एेसे में उन्हें काॅस्ट कवर करने के लिए कर्इ तरह की सुविधाआें को बंद करना पड़ सकता है। भारत की तरफ से डेटा लोकलाइजेशन का बिगुल बजने के बाद कर्इ टेक कंपनियों के लाॅबिंग के बाद अब फ्री ट्रेड को लेकर भी बहस छिड़ गर्इ है। वर्ल्ड ट्रेड आॅर्गेनाइजेश के एक अधिकारी ने भी डेटा स्थानीयरण को बैन करने तक की मांग की है। वहीं न्यूज एजेंसी राॅयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक अमरीकी सांसद ने भारत से अपील की है कि वो इससे जुड़े नियमाें
में थोड़ी ढील दे।
क्या है डेटा स्थानीयकरण का मतलब
इस मामले से जुड़े कर्इ जानकारों व विशेषज्ञों का मानना है कि वो भौतिक रूप से डेटा स्थानीयरकण का कोर्इ मतलब नहीं बनता है। आपक डेटा को दुनिया के किसी भी कोने से एक्सेस किया जा सकता है। चिंता की बात यह है डेटा लोकलाइजेशन से कंपनियों का अाॅपरेटिंग काॅस्ट आैर अनुपालन में असर पड़ेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात क्वालिटी है, न की क्वांटिटी। इतनी तेजी से डेटा बढ़ने के बाद भी अभी तक यह समझना मुश्किल है कि आखिर किसे इन डेटा का एक्सेस है आैर वो इसका क्या गलत इस्तेमाल कर सकते हैं।
दुनियाभर में क्या है डेटा सुरक्षा को लेकर नियम
यूरोपियन यूनियन जनरल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम में डेटा रेग्युलेशन को लेकर कोर्इ खास नियम नहीं है। इसमें सिर्फ इस बात का जिक्र है कि क्राॅस बाॅर्डर डेटा तभी साझा किया जा सकता है जब दूसरे देश में यह सुरक्षित रह सके। दूसरे कर्इ देशों में डेटा लोकलाइजेशन को लेकर अपने नियम है। जैसे नाइजीरिया में साल 2013 के बाद कंज्यूमर व सबस्क्राइबर्स का डेटा टेक व टेलीकाॅम फर्म्स को देश में ही स्टोर करने का नियम है। जर्मनी में टेलिकाॅम आैर इंटरनेट सर्विस डेटा प्राेवाइडर्स को देश में ही डेटा स्टोर करने का नियम है। रूस के नियमां के मुताबिक सभी नगारिकों को डेटा देश में ही स्टोर किया जाए।