जबलपुर

यहां हुआ था सृष्टि का पहला पितर तर्पण, इस देवता ने किया था पिंडदान

यहां हुआ था सृष्टि का पितर तर्पण, इस देवता ने किया था पिंडदान

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Sep 18, 2018
2018 Shradh Dates Shradh 2018 Dates Pitru Paksha Shraddha vidhi

जबलपुर। पितरों की आत्मा की शांति व मोक्ष गति के लिए हर साल पितर पक्ष के पंद्रह दिनों में लोग विविध पूजन अनुष्ठान करते हैं। महालय पर्व पर मृत आत्माओं का अपने परिजनों के घर पर आगमन होता है। इस दौरान की पूजन सेवा आदि करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है, वे प्रसन्न होकर सुख समृद्धि का आशीर्वाद देकर विदा लेते हैं। पं. जनार्दन शुक्ला के अनुसार सृष्टि का पहला श्राद्ध जबलपुर स्थित मां नर्मदा के तट पर हुआ था। जिसे स्वयं इंद्र देव ने किया था। ऐसा पुराणों में उल्लेख मिलता है। यहीं पर गयाजी तीर्थ हुआ करता था, जो नर्मदा ने गंगा के पृथ्वी आगमन पर उन्हें दे दिया था।


संस्कारधानी के त्रिपुरी तीर्थ स्थित नर्मदा तट पर एक ऐसा स्थान है जहां देवताओं के राजा इंद्र ने स्वयं अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान किया था। मान्यता है कि लम्हेटाघाट के समीप स्थित इंद्र गया से ही पिंडदान की शुरुआत हुई थी। आज भी यहां हजारों श्रद्धालु पिंड दान करने के लिए पहुंचते हैं। नर्मदा किनारे स्थित इंद्र गया में प्रकृति ने भी इतना सौंदर्य उड़ेला है कि लोग उसके आकर्षण में बंधे रह जाते हैं।

मनु ने भी किया था श्राद्ध
नर्मदा चिंतक शुक्ल ने बताया कि शास्त्रों में वर्णित है कि देवराज इंद्र ने अपने पूर्वजों की आत्मा को शांति प्रदान करने एवं मोक्ष के लिए नर्मदा के लम्हेटाघाट स्थित गयाजी कुण्ड में किया था। जिसका प्रमाण गयाजी कुण्ड के पास देवराज इंद्र के वाहन ऐरावत हाथी के पद चिह्न आज भी देखे जा सकते हैं। पुराणों के अनुसार पृथ्वी के प्रथम राजा मनु ने भी यहां पर अपने पितरों का श्राद्ध किया था । पौराणिक महत्ता के अनुसार नर्मदा को श्राद्ध की जाननकी कहा जाता है।

IMAGE CREDIT: lali koshta

कहलाता है त्रिशूलभेद नागक्षेत्र
पुराणों के अनुसार तिलवाराघाट उत्तर दक्षिण तट त्रिशूलभेद नागक्षेत्र भी कहलाता है। त्रिशूलभेद की महत्ता का उल्लेख नर्मदा पुराण में किया गया है। जिसमें बताया गया है कि नर्मदा परिक्षेत्र में किया गया श्राद्ध गंगा के गया तीर्थ से भी सर्वोपरि है।

कुम्भेश्वर तीर्थ में कटते हैं संकट
लम्हेटाघाट में एक अन्य कुम्भेश्वर तीर्थ भी मौजूद है। इसके लिए कथा प्रचलित है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, लक्ष्मण व हनुमान ने ब्रह्म हत्या व शिव दोष से मुक्ति के लिए 24 वर्ष तक तपस्या व उपासना की थी। इसके प्रमाण स्वरूप यहां का कुम्भेश्वर तीर्थ मंदिर है, जिसमें एक जिलहरी पर दो शिवलिंग स्थापित हैं।

नर्मदा आई तब मिली पितरों को मुक्ति
स्कंद पुराण के रेवाखंड के अनुसार श्राद्ध क्या है, क्यों करना चाहिए। इस बात पर विचार मंथन करते हुए बताया कि गया है कि प्राचीनकाल में ऋषि,मुनि, देवता और दानवों को भी श्राद्ध का पता नहीं था। जिससे उनके पितरों की आत्माएं पृथ्वी लोक में भटकती रहती थीं। सतयुग के आदिकल्प के प्रारंभ में जब मां नर्मदा पृथ्वी पर प्रकट हुईं, तब स्वयं पितरों द्वारा ही श्राद्ध किया गया और उन्हें मुक्ति मिली। श्राद्ध कन्या के सूर्य राशि में भ्रमण के दौरान ही आश्विन कृष्ण पक्ष की पूर्णिमा से श्राद्ध अर्थात महालय से अमावस्या के तक किया जाता है।

Updated on:
18 Sept 2018 03:35 pm
Published on:
18 Sept 2018 01:35 pm
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