MP News: जब बच्चा अकेलापन, बोरियत, असुरक्षा या तनाव जैसी भावनाओं को नहीं संभाल पाता, तो वह तुरंत राहत की तलाश करता है।
MP News: आधुनिक दौर में अभिभावकों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि उनका बच्चा दिनभर मोबाइल या स्क्रीन से चिपका रहता है। जबलपुर के बाल मनोवैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने एक चौंकाने वाला विश्लेषण साझा किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि जिसे पैरेंट्स मोबाइल की लत समझ रहे हैं, वह असल में मुख्य समस्या नहीं बल्कि एक 'लक्षण' (स्पिटम) है। असली जड़ (रूट कॉज) बच्चे के भीतर पनप रही भावनात्मक रिक्तता और असुरक्षा है।
एडोलोसेंट काउंसलर डॉ. पंकज ग्रोवर के अनुसार अक्सर देखा गया है कि जब बच्चा अकेलापन, बोरियत, असुरक्षा या तनाव जैसी भावनाओं को नहीं संभाल पाता, तो वह तुरंत राहत की तलाश करता है। डिजिटल दुनिया उसे मोबाइल गेम के माध्यम से राहत रूपी एस्केप बटन के देती है। गेम में मिलने वाली जीत का अहसास और सोशल मीडिया का अंतहीन मनोरंजन उसे उस भावनात्मक दर्द से कुछ समय के लिए दूर ले जाता है, जिसे वह व्यक्त नहीं कर पाता। विशेषज्ञों के अनुसार, स्क्रीन केवल ध्यान भटकाने का एक जरिया मात्र है।
डॉ. ग्रोवर ने बताया कि बच्चे की सबसे बड़ी बुनियादी जरूरत इमोशनल कनेक्शन यानी भावनात्मक जुड़ाव है। जब घर में बच्चे को लगता है कि उसकी बात सुनी नहीं जा रही है या उसे केवल डांट और आदेश मिल रहे हैं, तो वह डिजिटल दुनिया में शरण लेने लगता है। वहां उसे कोई टोकने वाला नहीं होता और न ही कोई उसे जज करता है। ऐसे में मोबाइल की लत वास्तव में माता-पिता और बच्चे के बीच कनेक्शन की कमी का एक बड़ा संकेत है।
बच्चों का मस्तिष्क विकासशील अवस्था में होता है, इसलिए उन्हें यह सिखाना पड़ता है कि गुस्से, उदासी या हार मिलने पर अपनी भावनाओं को कैसे संभालें (इमोशनल रेगुलेशन)। जब बच्चा इन कठिन भावनाओं को संभालना नहीं सीख पाता, तो स्क्रीन उसके लिए एक ब्रह्मास्त्र की तरह काम करती है जो तुरंत खुशी देकर उसकी समस्याओं को दबा देती है।
विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि केवल मोबाइल छीन लेना समस्या का समाधान नहीं है। इसके लिए ठोस व संयमित कदम उठाने की आवश्यकता है।
भावनात्मक बॉन्डिंग- बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताएं, संवाद बढ़ाएं और उनके भीतर विश्वास जगाएं।
भावनाओं की पहचान- बच्चे को अपनी भावनाएं पहचानना और उन्हें सही तरीके से व्यक्त करना सिखाएं।
सुरक्षित वातावरण- जब बच्चे को घर में समझ, जुड़ाव और भावनात्मक सुरक्षा मिलने लगती है, तो स्क्रीन की लत अपने आप कम होने लगती है।
परिणाम- यदि बच्चा मोबाइल ज्यादा देख रहा है, तो उसे नियंत्रित करने के बजाय यह समझने की कोशिश करें कि वह किस बात से परेशान है। याद रखें, जुड़ाव ही सुधार की पहली सीढ़ी है।