भ्रष्ट लोकसेवकों को बचा रही सरकार की चुप्पी!

पत्रिका विशेष : लोकायुक्त को 75 प्रतिशत मामलों में सरकार की स्वीकृति का इंतजार, संभाग में 37 मामले लंबित, कागजी कार्रवाई में उलझे प्रकरण
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Updated: 25 Oct 2016, 2:11 AM IST
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रामकृष्ण परमहंस पांडेय
जबलपुर. संभाग में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की सरकारी नीति को जमकर पलीता लग रहा है। लोकायुक्त ने बीते एक-डेढ़ साल में जिन लोक सेवकों को रंगे हाथों दबोचा, उनमें ज्यादातर रसूख के दम पर चालानी कार्रवाई से बचे हुए हैं। लोकायुक्त को भ्रष्टाचार के 37 प्रकरणों में मंत्रालय स्तर से अभियोजन स्वीकृति का इंतजार है। यही वजह है कि कार्रवाई के 90 दिन बाद भी ये मामले कोर्ट तक नहीं पहुंच पाए हैं। सुनवाई लंबित होने से आरोपितों को लोकायुक्त सजा दिला पाने में नाकाम है। सूत्रों की माने तो केवल 25 फीसदी में अभियोजन की मंजूरी मिल पाती है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19(1),(सी) के अंतर्गत चालानी कार्रवाई के लिए स्वीकृति मांगने का प्रावधान है। लेकिन मौजूदा कानून में यह बाध्यकारी न होकर सरकार की मांशा पर निर्भर है।

दो वर्ष से पेंडिंग
लोकायुक्त ने भ्रष्टाचार और घूस लेने के कई मामलों में अधिकारियों, कर्मचारियों व निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज किए हैं। नरङ्क्षसहपुर जिला परियोजना प्रबंधक उदय प्रताप सिंह भदौरिया के मामले में अभियोजन स्वीकृति का प्रस्ताव दो साल पहले मंत्रालय भेजा गया था। लेकिन आरोपित अधिकारी के खिलाफ अब तक अभियोजन स्वीकृति नहीं मिल सकी। छिंदवाड़ा में पदस्थ लोक निर्माण विभाग के कार्यपालन यंत्री संजय डेहरिया सहित कई लोक सेवकों के मामले में यही स्थिति है। लोकायुक्त कार्यालय जबलपुर के पत्राचार के बाद मुख्यालय ने अप्रैल 2014 से लेकर जून 2015 तक 5 बार अभियोजन स्वीकृति की मांग की लेकिन मंत्रालय द्वारा अनुमति नहीं दी जा रही है।

90 दिन में अनुमति के प्रावधान
लोकायुक्त के जानकारों का कहना है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं में दर्ज प्रकरणों में अभियोजन की स्वीकृति अधिकतम 90 दिनों में मिल जानी चाहिए। लोकायुक्त जांच के बाद मामला मुख्यालय भेजता है, उसके बाद इसे विधि मंत्रालय भेजा जाता है। वहां से स्क्रूटनी के बाद अभियोजन स्वीकृति हेतु केस संबंधित विभाग के मंत्रालय भेजा जाता है। इस प्रक्रिया के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ही अधिकतम 90 दिन का समय निर्धारित किया है। शीर्ष कोर्ट के स्पष्ट दिशानिर्देश के बावजूद राज्य सरकार अभियोजन की स्वीकृति मामले में कोई सख्त कानून नहीं बना पाई है।

लंबित मामले (जनवरी-2014 से अब तक)
उदय प्रताप सिंह भदौरिया, जिला परियोजना प्रबंधक, नरसिंहपुर
संजय डहेरिया, कार्यपालन यंत्री पीडब्ल्यूडी, छिंदवाड़ा
डॉ. विजय गांधी, जिला अस्पताल बालाघाट
शरद कुमार बिल्लोरे, लिपिक, जबलपुर विकास प्राधिकरण
संतोष सिंह क्षत्रीय, पटवारी, पनागर जबलपुर
रामचरण पटेल, जल प्रदाय विभाग, नगर निगम जबलपुर
डॉ. सत्येन्द्रकुमार चड़ार, चिकित्सा अधिकारी, सीएचसी पाटन जबलपुर
लालबहादुर सिंह बघेल, पटवारी, पनागर जबलपुर
प्रदीप शर्मा, सीईओ जनपद पंचायत, नरसिंहपुर
श्यामलाल प्रजापति, जिला आपूर्ति अधिकारी, डिंडोरी
पुरुषोत्तम बिसेन, सहकारी समिति उपाध्यक्ष, बालाघाट
कमलेश कुमार अवस्थी, सहायक संचालक पिछड़ा वर्ग अल्पसंख्यक कल्याण, डिंडोरी
दयाल सिंह राठौर, वनपाल पेंच टाइगर रिजर्व, सिवनी
खुशाल शाह युनाथी, वन रक्षक, छिंदवाड़ा
गुरुनानक धुर्वे, तहसीलदार, ङ्क्षछदवाड़ा
कृष्णकुमार विश्वकर्मा, पटवारी, छिंदवाड़ा
जय कुमार पटेल, सेल्समैन, कटनी
चंद्रेशेखर डेहरिया, लेखापाल, सिविल अस्पताल ङ्क्षछदवाड़ा
शेषधर बडग़ैंया, सेल्समैन, कटनी
अशोक राय, पटवारी नरसिंहपुर
सुंदरलाल धुर्वे, राजस्व निरीक्षक, मंडला
सेवकराम सनोडि़या, रोजगार सहायक, सिवनी
बाला प्रसाद सोनी, लिपिक, तहसील स्लीमनाबाद कटनी
मुलैया सिंह मरावी, पटवारी, डिंडौरी
कन्हैयालाल सोनी, पटवारी, डिंडौरी
लल्लू लाल गुप्ता, उपयंत्री जनपद शिक्षा केन्द्र मंडला
शकुंतला धुर्वे, सरपंच, मंडला
यमुना प्रसाद सोनी, पटवारी, छिंदवाड़ा
मोचन कुमार सेन्द्राम, पटवारी, मंडला
दीपक कुव्र्हे, ग्राम रोजगार सहायक, बालाघाट
खेमचंद साहू, सरपंच, छिंदवाड़ा
विजय कुमार पारधी, लिपिक, आयुष कार्यालय बालाघाट
संतराम पंद्राम, उपयंत्री ग्रामीण यांत्रिकी सेवा, सिवनी
राजेश कुमार गुप्ता, सहायक यंत्री जल संसाधन विभाग, छिंदवाड़ा
अमित कुमार सेवरीवार, उपयंत्री ग्रामीण यांत्रिकी सेवा, मंडला
ठगराम इनवाती सरपंच एवं ग्राम रोजगार सहायक हीरालाल, सिवनी
भूरिया बाई, सरपंच, छिंदवाड़ा

शासन की मंशा पर निर्भर
अभियोजन की स्वीकृति सरकार की मंशा पर निर्भर है। मंजूरी के बाद ही फौजदारी मुकदमों को कोर्ट में आगे बढ़ाया जा सकता है। अभियोजन स्वीकृति न मिलने के कारण मामला वर्षों तक अटका रहता है। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया है कि 90 दिन में अभियोजन स्वीकृति न मिलने की दशा में उसे डीम परमीशन मानते हुए मुकदमा चलाया जाए, लेकिन कानून बनाए बगैर यह सिर्फ सुझाव तक सीमित है। सरकार को 90 दिन में अभियोजन स्वीकृति का कानून बनाना चाहिए।
जस्टिस पीपी नावलेकर, पूर्व लोकायुक्त, मप्र
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