इतिहासकार बताते हैं कि उस समय मड़ई व चंडी मेलों में वीरांगना व उनके गुप्तचरों की गुप्त रणनीति बनती थीं।
madai mela : दीपोत्सव के बाद आयोजित होने वाले मढ़ई और चंडी मेलों की परम्परा निभाने के लिए इस बार भी तैयारियां शुरू हा गई हैं। रानी दुर्गावती के काल से यह परिपाटी चली आ रही है। इतिहासकार बताते हैं कि उस समय मड़ई व चंडी मेलों में वीरांगना व उनके गुप्तचरों की गुप्त रणनीति बनती थीं।
दीपावली के बाद पंद्रह दिनों तक शहर में जगह-जगह मड़ई व चंडी मेले लगेंगे। मूलत: आदिवासियों से जुड़े इन मेलों के लिए निर्धारित जगहों की सफाई की जा रही है। चंडी स्थापना की तैयारियां भी हो रही हैं। गोवर्धन पूजा के साथ आरंभ होने वाले मड़ई मेलों की धूम विभिन्न इलाकों में पूर्णिमा तक रहेगी। इनमे ग्रामीण संस्कृति की झलक दिखाई देगी। मंनोरजन के साथ ही देशी घरेलू चीजों की भी खरीदारी होगी।
इतिहासकार डॉ. आनंद सिंह राणा के अनुसार मढ़ई व चंडी मेलों में रानी दुर्गावती भी विशेष रुचि लेती थीं। इनमें बैठक कर गुप्त रणनीति बनाई जाती थी। इनमें दूसरे राज्यों से गुप्तचर भी शामिल होते थे। सैनिक और बड़े पदाधिकारी भी वेश बदलकर मढ़ई मेला जाते थे। गोंडवाना गढ़ा, गुलौआ क्षेत्र में आयोजित वाली मढ़ई सबसे पुरानी मानी जाती है।
युवा वर्ग के लिए मढ़ई व चंडी मेलों का सबसे बड़ा आकर्षण लकड़ी के पारम्परिक रहट में झूलना है। इसके लिए युवाओं के बीच होड़ लगती है। रहट में झूलने के साथ ही रूमाल फेंककर उठाने का खेल खासा पसंद आता है। गढ़ा की अनामिका बर्मन कहती हैं कि मढ़ई में रहट झूलने का उन्हें साल भर इंतजार रहता है।
मढ़ई मेलों में ग्रामीण अंचल के पारंपरिक पकवानों का स्वाद लिया जा सकता है। खासकर गुड़ की जलेबी व सेव की दुकानों में लोगों की कतारें लगती हैं। सिंघाड़े व पिड़ी भी लोगों की पसंद में शामिल है। गौरीघाट निवासी सुजीत अवस्थी कहते हैं कि मढ़ई में ताजे गुड़ की जलेबी बहुत अच्छी लगती है।
मढ़ई और चंडी मेला मूलत: देवी उपासना को समर्पित होते हैं। गन्ने की चौकोर मढ़ई के नीचे अहीर समुदाय दिवारी गाकर मेले की शुरुआत करते हैं। चंडी मेला में गन्ने की ही पर्वताकार चंडी बनाकर पूजा करते हैं। इन मेलों को शक्ति और भक्ति का प्रतीक माना जाता है।
लालमाटी निवासी श्याम ठाकुर ने बताया कि मढ़ई और चंडी की पूजा करने के बाद बड़ी संख्या में लोग अहीरों से चकोड़ा प्रजाति की वनस्पति ममरा को अभिमंत्रित कराते हैं। उनका मानना है कि अहीरों के अभिमंत्रित ममरा को दरवाजे पर बांधने से व्याधियां व बीमारियां घर में नहीं आतीं।