ओबीसी आरक्षण पर लगाई गई याचिका, शीर्ष कोर्ट ने मप्र हाईकोर्ट को कहा...।
जबलपुर। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से राज्य सरकार के उस फैसले को चुनौती देने वाली रिट याचिका पर जल्द से जल्द फैसला करने का अनुरोध किया, जिसमें अखिल भारतीय आयुष स्नातकोत्तर प्रवेश परीक्षा, 2021 में प्रवेश के लिए ओबीसी वर्ग के आरक्षण को 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी करने का निर्णय लिया गया था।
मप्र आयुष निदेशालय के निदेशक द्वारा सुको में दायर विशेष अनुमति याचिका में मप्र हाईकोर्ट द्वारा पारित अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई। मप्र हाईकोर्ट के समक्ष याचिका में मध्य प्रदेश लोक सेवा की धारा-4 को चुनौती दी गई थी। इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण को 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी करने का प्रावधान किया गया है। कहा गया कि यह सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी के निर्णय के विरोध में होने के कारण असंवैधानिक है। अंतरिम आदेश में हाईकोर्ट ने शैक्षणिक वर्ष 2022-2023 के आयुष पाठ्यक्रमों में प्रवेश 14 फीसदी तक सीमित ओबीसी के आरक्षण के आधार पर ही करने का निर्देश दिया था।
ईडब्ल्यूएस आरक्षण पर क्या कहा हाईकोर्ट ने
इससे पहले, मध्यप्रदेश हाइकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा था कि एससी, एसटी व ओबीसी को गरीब तबके के लिए निर्धारित 10 फीसदी ईडब्ल्यूएस आरक्षण क्यों नहीं दिया जा रहा है? जस्टिस सुजय पाल व जस्टिस द्वारकाधीश बंसल की डिवीजन बेंच ने इस मामले पर राज्य सरकार व अन्य को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। अगली सुनवाई 01 अप्रेल नियत की गई। एडवोकेट यूनियन फार डेमोक्रेसी एन्ड सोशल जस्टिस की ओर से याचिका दायर की गई। याचिका में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 10 फीसदी आरक्षण की 2 जुलाई 2019 को जारी अधिसूचना की संवैधनिकता को चुनौती दी गई । तर्क दिया गया कि उक्त पॉलिसी में ओबीसी, एससी, एसटी को आरक्षण के लाभ से वंचित किया गया। जबकि संविधान में ईडब्ल्यूएस का लाभ समाज के सभी वर्गों को दिए जाने का प्रावधान है।