- मन सही है, तो इस कठौती के जल में ही गंगा स्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है
जबलपुर . भारत की मध्ययुगीन संत परंपरा में संत रविदास या रैदास का स्थान महत्वपूर्ण रहा है। रैदास, कबीर के समकालीन संत थे। संत-कवि रविदास का जन्म वाराणसी के पास एक गांव में सन् 1398 में माघ पूर्णिमा के दिन हुआ था। संत रविदास संघ के सदस्य रामआसरे प्रजापति बताते हैं किरविवार के दिन जन्म होने के कारण इनका नाम रविदास रखा गया। उन्हें संत रामानंद का शिष्य माना जाता है। रविदास संघ के सदस्य रामआसरे प्रजापति बताते हैं कि
भक्ति मार्ग को अपनाया
हिंदी साहित्य के इतिहास में मध्यकाल, भक्तिकाल के नाम से प्रख्यात है। इस काल में अनेक संत एवं भक्त-कवि हुए जिन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों को समाप्त करने के प्रयास किए। इन महान संतों व कवियों की श्रेणी में रैदास का प्रमुख स्थान रहा है। उन्होंने जाति, वर्ग एवं धर्म के मध्य की दूरियों को मिटाने और उन्हें कम करने का भरसक प्रयत्न किया। रविदास, भक्त, साधक और कवि थे। उनके पदों में प्रभु भक्ति-भावना, ध्यान-साधना तथा आत्म-निवेदन की भावना प्रमुख रूप में देखी जा सकती है। रैदास ने भक्ति के मार्ग को अपनाया था।
मन चंगा तो कठौती में गंगा
उनके जीवन की घटनाओं से उनके गुणों का ज्ञान होता है। एक घटना अनुसार, गंगा स्नान के लिए रैदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया, तो वे बोले, गंगा स्नान के लिए मैं अवश्य जाता, परंतु मैंने किसी को आज ही चरण पादुका बनाकर देने का वचन दिया है और अगर मैं उसे यह नहीं दे सका, तो वचन भंग हो जाएगा। अत: मन सही है, तो इस कठौती के जल में ही गंगा स्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है। कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही यह कहावत प्रचलित हो गई कि मन चंगा तो कठौती में गंगा। उनके भक्ति गीतों एवं दोहों ने समाज में सम-रसता एवं प्रेम भाव उत्पन्न करने का प्रयास किया है। वह कहते हैं कि तीर्थ यात्राएं न भी करें, तो भी ईश्वर को अपने हृदय में पाया जा सकता है।
मधुर व्यवहार
संत रैदास के जन्म के संबंध में उचित प्रामाणिक जानकारी मौजूद नहीं है। कुछ विद्वान काशी में जन्मे रैदास का समय 1482-1527 ई. के बीच मानते हैं, तो कुछ कहते हैं कि उनका जन्म काशी में 1398 में माघ पूर्णिमा के दिन हुआ था। इनके पिता का नाम रग्घु और माता का नाम घुरविनिया बताया जाता है। उनका पैतृक व्यवसाय चर्मकार कर्म था और उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार किया। उनकी समयानुपालन की प्रवृत्ति तथा मधुर व्यवहार के कारण लोग उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे।