मौतों के बाद उनके रहस्यों से पर्दा सालों तक नहीं उठ पाता है
जबलपुर। दुबई के एक होटल में श्रीदेवी की रहस्मयी मौत से वहां की फॉरेंसिक रिपोर्ट ने पर्दा उठाया, जिसमें बताया गया कि उनकी मौत अधिक शराब पीने से हुई है। अब भी बॉलीवुड की चांदनी की मौत रहस्यों के साथ कई सवाल भी छोड़ गई है। हालांकि आज अंतिम संस्कार भी हो रहा है। वहीं सामान्य मौतों के बाद उनके रहस्यों से पर्दा सालों तक नहीं उठ पाता है। जिससे कई बार अपराधियों या उनके हत्यारों को सजा मिलने में देरी हो जाती है। इसकी मुख्य वजह जो सामने आई वह है डॉक्टरों द्वारा तैयार की जाने वाली पोस्टमॉर्टम व एमएलसी रिपोर्ट हैं। जो कई बार खुद डॉक्टर ही नहीं पढ़ पाते हैं। ऐसे में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मप्र हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। जिसके बाद पीडि़तों के परिजन आसानी से डॉक्टरों की रिपोर्ट पढ़ पाएंगे और कारण भी जान सकेंगे।
अब अपराधिक मामलों में कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की जाने वाली मेडिको लीगल रिपोर्ट व पोस्ट मार्टम रिपोर्ट अदालत, वकीलों व पक्षकारों को भी आसानी से समझ में आ जाएंगी। मप्र हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हेमंत गुप्ता व जस्टिस वीके शुक्ला की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार को कहा है कि चार्जशीट के साथ इन रिपोर्ट्स की टाइप्ड या कम्प्यूटराइज्ड प्रतिलिपि भी संलग्न की जाए। इसमें नियमानुसार प्रमाणित करने वाले के डिजिटल सिग्नेचर हों।
मंडला रोड निवासी अधिवक्ता अमिताभ गुप्ता ने २०१३ में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि निचली अदालतों में अपराधिक मामलों में पेश की जाने वाली मेडिको लीगल व पोस्ट मार्टम रिपोर्ट हाथ से लिखी हुई पेश की जाती है। जल्दबाजी में लिखी गई इन रिपोट्र्स की हस्तलिपि इतनी खराब होती है कि सामान्यत: इन्हें पढऩा और समझना टेढ़ी खीर होता है। कई मामलों में तो कोर्ट को भी इन रिपोट्र्स को समझने में दिक्कत होती है। याचिकाकर्ता ने स्वयं अपना पक्ष रखते हुए कोर्ट को बताया कि बेतरतीबी से बनाई गई इन रिपोट्र्स से महत्वपूर्ण अपराधिक मामलों के विचारण में अनावश्क विलंब होता है।
न्याय प्रबंधन के दृष्टिकोण से भी ये रिपोटर््स असुविधाजनक हैं। उन्होंनेे कहा कि निचली अदालत में विचारण के दौरान अक्सर यह देखा जाता है कि अधिकांश डॉक्टर स्वयं की लिपि में लिखी रिपोर्ट को भी समझने-समझाने में असफल रहते हैं।
मेडिको लीगल साक्ष्य अहम-
उन्होंने तर्क दिया कि आपराधिक मामलों में मेडिको लीगल साक्ष्य अत्यधिक महत्वपूर्ण होते हैं। अक्सर इनमें एमएलसी व पीएम रिपोर्ट के आधार पर फैसले होते हैं। लेकिन खराब लिखावट व अपठनीय होने के चलते कई बार इनके अर्थ को समझने में त्रुटि की आशंका रहती है। सुनवाई के बाद कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए कि अपराधिक मामले में चार्जशीट पेश करने वाले अधिकारी को मूल हस्तलिखित एमएलसी व पीएम रिपोर्ट के साथ उसकी टाइप की गई या कम्प्यूटारइज्ड प्रति भी पेश करने के निर्देश दिए जाएं। ताकि तीन माह की समयावधि में इनका पालन सुनिश्चित किया जा सके।