Educated Unemployed: बस्तर संभाग में 1 लाख 97 हजार से अधिक शिक्षित युवा बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं। रोजगार योजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों तक प्रभावी नहीं पहुंच पा रहीं, जिससे पलायन की समस्या भी बढ़ रही है।
Educated Unemployed: छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद से बस्तर के हजारों युवा आज तक युवा रोजगार के नाम पर ठगे जा रहे हैं। शिक्षित युवाओं की संख्या बढऩे के साथ ही बेरोजगारी की दरों में हर साल वृद्धि हो रही है। हर चुनाव में रहने वाले रोजगार के दावें खोखले साबित होते हैं, नतीजा यह है कि बस्तर संभाग के 1 लाख 97 हजार से अधिक शिक्षित बेरोजगारों के पास रोजगार नहीं हैं। इधर सरकारी विभागों में हजारों रिक्त पदों पर भर्ती नहीं हो रही है।
ऐसे में बस्तर का युवा खुद को ठगा महसूस कर रहा है, योग्यता के आधार पर नौकरी नहीं मिलने पर रोजगार के लिए समझौता कर रहा है। बस्तर के आदिवासी युवाओं को अन्य जिले और राज्यों में पलायन करने की नौबत है। बस्तर संभाग के सभी जिलों यह बेरोजगारी के आंकड़ें बढ़ते जा रहे हैं, रोजगार एवं मार्गदर्शन केन्द्र की ओर से जारी पंजीयन आंकड़े बताते हैं कि कांकेर में 59,897, बस्तर में 43,935, जबकि सबसे कम पंजीयन सुकमा में 11,398 और नारायणपुर में 10,664 हुआ है।
यह आंकड़ा स्पष्ट रूप से यह दिखाता है कि राज्य सरकार की रोजगार योजनाएं ग्रामीण इलाकों तक प्रभावी रूप से नहीं पहुँच पा रही हैं। कोरोना के बाद से यह स्थिति और भी गंभीर हो चुकी है। बस्तर से बड़े पैमाने पर युवा पलायन कर रहे हैं जिन्हें स्थानीय स्तर पर रोकने के लिए कोई भी ठोस प्रयास होते नहीं दिख रहा है।
सरकार अक्सर रोजगार और मार्गदर्शन केंद्रों की बात करती है, लेकिन इन केंद्रों की भूमिका केवल प्लेसमेंट एजेंसियों तक सीमित रह गई है। हजारों रिक्त पद होने के बावजूद सरकारी भर्तियों में लगातार देरी हो रही है, जिससे युवाओं का विश्वास सरकारी नीतियों पर टूट रहा है।
विशेष रूप से बस्तर के ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी का संकट गहराया है। इससे युवा न केवल अपने जिले में रोजगार की कमी का सामना कर रहे हैं, बल्कि अन्य जिलों और राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं। यह पलायन स्थानीय विकास और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।
सरकारी योजनाओं का केवल नाममात्र का क्रियान्वयन और प्रशासनिक सुस्ती ही इस संकट की सबसे बड़ी वजह है। अगर जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो युवा पीढ़ी का विस्थापन और राज्य की सामाजिक-आर्थिक असमानताएं और गहरा सकती हैं।