
मनोज साहू/Indravati Tiger Reserve: दक्षिण बस्तर के जंगल में जिंदगी और मौत से जूझ रहे एक नर बाघ को वन विभाग ने रेस्क्यू कर इलाज तो करा दिया, लेकिन उसकी कहानी का सबसे अहम सवाल अब भी बाकी है। क्या इलाज के बाद उसे उसके प्राकृतिक घर यानी जंगल में वापस लौटने का मौका मिला? इंद्रावती टाइगर रिजर्व के बफर जोन में शिकारियों के फंदे में फंसकर घायल हुए 6 से 8 वर्षीय बाघ को गंभीर हालत में रायपुर की जंगल सफारी भेजा गया था। उपचार के बाद उसकी हालत में सुधार हुआ, लेकिन जंगल में वापसी की जगह वह अब सफारी में ही लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गया है।
17 अप्रैल 2025 को बीजापुर जिले में कांदुलनार, मोरमेड़ और तोयनार गांवों के बीच घने जंगल में ग्रामीणों ने घायल बाघ को देखा था। सूचना मिलने पर वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची। बाघ के पिछले दोनों पैरों में तार का फंदा बुरी तरह फंसा था और कई दिनों पुराने घाव में कीड़े पड़ चुके थे। टीम ने बाघ को ट्रैंकुलाइज कर फंदा हटाया और प्राथमिक उपचार के बाद बेहतर इलाज के लिए जंगल सफारी रायपुर भेजा। जंगल सफारी पहुंचने के बाद विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में उपचार शुरू हुआ। घाव की सफाई कर टांके लगाए गए। लगातार उपचार के बाद बाघ की हालत में सुधार हुआ और उसके सामान्य स्थिति में आने की उम्मीद जताई गई।
इंद्रावती टाइगर रिजर्व लंबे समय तक नक्सल गतिविधियों के कारण सामान्य वन अमले की पहुंच से दूर रहा। अब कई इलाकों में सुरक्षा स्थिति बेहतर होने के साथ वन्यजीवों की निगरानी बढ़ाने की जरूरत भी सामने आ रही है। फंदे में फंसे बाघ की घटना जंगल में अवैध शिकार की चुनौती की ओर इशारा करती है। इसी क्षेत्र में वन्यजीवों की मौत और शिकार से जुड़े मामले पहले भी सामने आते रहे हैं। ऐसे में घायल बाघ सिर्फ एक वन्यजीव के रेस्क्यू की घटना नहीं, बल्कि जंगल में वन्यजीव सुरक्षा की जमीनी स्थिति पर भी सवाल खड़ा करता है।
बाघ की जान बचाना वन्यजीव संरक्षण की बड़ी जिम्मेदारी है, लेकिन इलाज के बाद उसे वापस उसी जंगल में छोड़ा जा सकता था, जहां वह स्वतंत्र रूप से विचरण करता था। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक घायल बाघ को लंबे समय तक कैद में रखने, नियमित रूप से तैयार भोजन मिलने और प्राकृतिक शिकार से दूर रहने का असर उसकी शिकार क्षमता पर पड़ सकता है। ऐसे में जंगल में वापस छोड़ने से पहले उसकी शारीरिक क्षमता, शिकार करने की क्षमता और प्राकृतिक परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता का आकलन जरूरी है।
जिस बाघ ने फंदे की पीड़ा झेली, इलाज के दौरान जिंदगी की जंग जीती, क्या उसकी अंतिम मंजिल जंगल सफारी ही होनी थी? यदि वह जंगल में लौटने की स्थिति में नहीं था तो क्या इसके पीछे विशेषज्ञों की लिखित रिपोर्ट और वैज्ञानिक आधार है? जान बचाना संरक्षण का पहला कदम है, लेकिन किसी वन्यजीव को उसके प्राकृतिक जीवन में वापस लौटाना संरक्षण की असली कसौटी है। इंद्रावती के इस बाघ की कहानी अब इसी सवाल के जवाब की तलाश कर रही है।
किसी भी वन्यजीव के स्वस्थ होने के बाद उसे वापस जंगल में भेजने का निर्णय वाइल्ड लाइफ कमेटी के सदस्यों द्वारा लिया जाता है। इसमें टाइगर रिजर्व प्रबंधन की कोई भूमिका नहीं होती। बाघ के जंगल में वापस नहीं लौटने और उसकी वर्तमान स्थिति के संबंध में जानकारी ली जाएगी— उत्तम कुमार गुप्ता, मुख्य वन संरक्षक, वन्यजीव बस्तर