आजादी के इस जश्न का रंग नक्सलगढ़ में भी दिख। आजादी के 77 साल बाद पहली बार बस्तर के 16 गांवों में तिरंगा फहराया गया। बस्तर पुलिस की तरफ से इस बात की जानकारी दी गई है।
Independence Day 2024: भले ही देश को अंग्रेजों से आजादी मिले 78 साल हो गए हों लेकिन बस्तर के इन 16 गावों को सही मायने में आजादी आज मिली है वह भी नक्सलवाद से। दरअसल यह इलाका कभी नक्सलियों का गढ़ हुआ करता था। इस वजह से यहां के ग्रामीण नक्सलियों के भय से स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा नहीं लहराते थे, बल्कि नक्सली इस दिन को काला दिवस के रूप में मनाते थे।
जवानों के बुलंद हौसलों की वजह से पुलिस ने इन खतरनाक इलाकों में लगातार कैंप खोले। जिससे अब इन इलाकों से नक्सली दूर होते गए और यहां लोकतंत्र स्थापित होता गया। जिसके चलते आज यहां के ग्रामीण भय मुक्त होकर आजादी का पर्व धूमधाम से मना रहे हैं। इन 16 गांवों में पहली बार ध्वजारोहण किया गया है उन गांव के ग्रामीण सीआरपीएफ और स्थानीय पुलिस के जवानों के साथ गांव में बकायदा तिरंगा रैली भी निकाली।
बस्तर के आईजी सुंदरराज पी. का कहना है कि पिछले 4 दशकों से नक्सलवाद ने बस्तर के इन इलाकों में पैंठ जमाया हुआ था। नक्सलियों के भय की वजह से यहां के ग्रामीण कभी देश का राष्ट्रीय पर्व को नहीं मना पाए और ना ही अपने गांव में नक्सलियों के भय की वजह से कभी तिरंगा लहरा पाए थे। लेकिन बीते कुछ सालों से बस्तर में नक्सल मोर्चे पर तैनात पैरामिलिट्री फोर्स और स्थानीय पुलिस फोर्स के बेहतर तालमेल से चलाए गए एंटी नक्सल ऑपरेशन से न सिर्फ नक्सलियों को बड़ा नुकसान पहुंचा है, बल्कि उनका दायरा भी सीमित हो गया है।
इस बार बस्तर संभाग के पांच जिलों के करीब 16 गांव ऐसे हैं जहां पहली बार तिरंगा फहराया गया है। छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर स्थित बीजापुर जिले पामेड़ थाने के धुर नक्सल प्रभावित गांव मेंडीगुड़ा में कोबरा के कमांडर देवेंद्र सिंह कसवां के प्रयासों से पहली बार फोर्स ने ग्रामीणों के साथ यहां ध्वजारोहण कर लोकतंत्र की मौजूदगी का एहसास कराया।
दंतेवाड़ा - नेरलीघाटी,
कांकेर - पानीडोबरी
बीजापुर - गुंडम, पूतकेल, मेंडीगुड़ा और छुटवाही
नारायणपुर - कस्तूरमेटा, मसपुर, इरकभट्टी और मोहंदी
सुकमा - मुलेर, परिया, सलातोंग, टेकलगुड़म, लाखापाल और पुलनपाड़