जगदलपुर

हमले से पहले गांव में 11 दिन तक क्या चल रहा था? झीरम घाटी के 185 पन्नों के फैसले में सामने आई अहम कड़ी

Chhattisgarh Naxal Attack: झीरम घाटी केस में NIA की विशेष अदालत के 185 पन्नों के फैसले में 206 गोलियां, 8-9 फीट का गड्ढा, 27 मौतें, गवाहियों और TIP पर कोर्ट की अहम टिप्पणियां सामने आईं।
3 min read
Jhiram Ghati
झीरम केस का 185 पन्नों का फैसला (Photo Source- Patrika Create)

Jhiram Ghati Attack: झीरम घाटी हमले की जांच और सुनवाई से जुड़े मामले में NIA की विशेष अदालत का करीब 185 पन्नों का फैसला सामने आया है। 25 मई 2013 को हुई इस भयावह घटना से जुड़े मामले में अदालत ने केवल हमले के दिन की घटनाओं को ही नहीं देखा, बल्कि आरोपितों को प्रतिबंधित माओवादी संगठन और हमले से जोड़ने वाले साक्ष्यों की विश्वसनीयता की भी विस्तार से जांच की। फॉरेंसिक रिपोर्ट, पोस्टमार्टम, बैलिस्टिक जांच, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को एक साथ रखकर अभियोजन की कहानी को परखा गया। NIA के अनुसार, झीरम घाटी हमले में 27 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 38 लोग घायल हुए थे।

Chhattisgarh News: 206 गोलियां और सड़क पर 8-9 फीट का गड्ढा

फैसले में दर्ज फॉरेंसिक साक्ष्यों के अनुसार घटनास्थल करीब 10,61,874 वर्गफुट क्षेत्र में फैला हुआ था। जांच के दौरान सड़क के बीच करीब आठ से नौ फीट का गड्ढा मिलने का उल्लेख किया गया है। यह गड्ढा विस्फोट के कारण बना था। मौके से अलग-अलग हथियारों के इस्तेमाल से जुड़े साक्ष्य भी मिले। इनमें 5.56 एमएम, 7.62 एमएम और एसएलआर हथियारों से संबंधित साक्ष्य शामिल थे। बैलिस्टिक जांच में करीब 206 गोलियां चलने की बात सामने आई। वहीं मेडिकल और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर 27 मौतों की प्रकृति हत्यात्मक होना स्थापित किया गया।

फैसले में 27 मोस्ट वांटेड माओवादियों का भी जिक्र

अदालत की ओर से 10 माओवादियों को मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद फैसले में मामले से जुड़े 27 मोस्ट वांटेड माओवादियों का भी उल्लेख किया गया है। इन्हें मामले में फरार बताया गया है। इनमें देवजी, देवा, सुरेंद्र, गणेश और अरुणाराव समेत कई नाम शामिल हैं। फैसले में यह भी उल्लेख है कि इनमें से कुछ लोगों ने बाद में आत्मसमर्पण किया, जबकि कुछ मुठभेड़ में मारे गए।

हमले से पहले 11 दिन तक क्या चल रहा था?

फैसले में दर्ज गवाहियों में हमले से पहले की माओवादी गतिविधियों, गांवों में बैठकों और प्रशिक्षण का भी उल्लेख मिलता है। गवाहों के अनुसार, हमले से पहले करीब 11 दिनों तक प्रशिक्षण और अलग-अलग गांवों में बैठकें होने की बात सामने आई। एक अभियोजन गवाह ने वर्ष 2009 में माओवादियों के साथ काम करने और करीब सात से आठ दिन तक प्रशिक्षण लेने की बात कही। वहीं दूसरी गवाही में वर्ष 2013 में गांव में माओवादी सदस्यों की बैठक होने का उल्लेख किया गया। बैठक में देवा, विनोद, महादेव, मुन्ना, जोगा और कोसा समेत कई नाम सामने आए। गवाही के अनुसार बैठक में पुलिस पर हमले के अलावा हथियार और अन्य सामान जुटाने को लेकर चर्चा हुई थी। कुछ गवाहों ने माओवादी सदस्यों के गांव में पहुंचने, ग्रामीणों को बैठक के लिए बुलाने और उनके लिए भोजन उपलब्ध कराने की बात भी कही।

कवासी लखमा के संबंध में गवाह ने क्या कहा?

फैसले में नंदकुमार पटेल के ड्राइवर की गवाही का भी उल्लेख है। गवाह ने बताया कि वाहन में तत्कालीन कांग्रेस नेता कवासी लखमा मौजूद थे और रास्ते में गोंडी भाषा में बातचीत हुई थी। इस गवाही को भी अदालत के सामने रखे गए साक्ष्यों के हिस्से के तौर पर दर्ज किया गया है। ऐसे बयानों की विश्वसनीयता का आकलन अदालत ने मामले के दूसरे साक्ष्यों और परिस्थितियों के साथ किया।

TIP नहीं हुई तो क्या अदालत में पहचान मान्य होगी?

मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने आरोपितों की पहचान को लेकर भी सवाल उठाए। बचाव पक्ष की दलील थी कि जांच के दौरान टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड यानी TIP नहीं कराई गई। अदालत में पहली बार आरोपितों की पहचान किए जाने को भी चुनौती दी गई। इस पर अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न न्यायिक दृष्टांतों का हवाला देते हुए कहा कि अदालत में की गई पहचान मूल साक्ष्य हो सकती है। TIP जांच की प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य अदालत में की गई पहचान की पुष्टि में सहायता करना होता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल TIP नहीं कराए जाने के आधार पर अदालत में की गई पहचान को स्वतः अस्वीकार नहीं किया जा सकता। हालांकि पहचान की विश्वसनीयता को अन्य प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के साथ परखा जाना जरूरी है।

देर से दर्ज बयान पर भी अदालत की अहम टिप्पणी

बचाव पक्ष ने कुछ गवाहों के धारा 161 के तहत बयान देर से दर्ज किए जाने को भी अपनी दलील का आधार बनाया। इस पर अदालत ने कहा कि केवल बयान दर्ज होने में देरी को आधार बनाकर किसी गवाही को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता। अदालत के अनुसार, ऐसी स्थिति में यह देखना जरूरी है कि बयान दर्ज करने में देरी क्यों हुई, उस समय मामले की परिस्थितियां क्या थीं और गवाह की बात दूसरे उपलब्ध साक्ष्यों से कितनी मेल खाती है। इस तरह झीरम घाटी मामले का करीब 185 पन्नों का फैसला केवल हमले में इस्तेमाल हथियारों, गोलियों और विस्फोट के फॉरेंसिक साक्ष्यों तक सीमित नहीं है। इसमें हमले से पहले की गतिविधियों, गवाहों की गवाही, आरोपितों की पहचान और जांच के दौरान सामने आई आपत्तियों पर भी अदालत की विस्तृत पड़ताल दर्ज है।

Updated on:
18 Sept 2026 05:03 pm
Published on:
18 Sept 2026 04:05 pm