जयपुर

आत्मनिर्भर ऊर्जा की ओर भारत की बड़ी छलांग

भारत के पास थोरियम की सबसे बड़ी खदानें हैं, जो सैकड़ों सालों तक बिजली देती रह सकती हैं।

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Apr 21, 2026

पूजा प्रसाद स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखिका - विश्व के कई हिस्सों में चल रहे युद्धों से जहां पूरी दुनिया मानो बारूद के ढेर बैठी प्रतीत होती है, वहीं भारत ने अपने हिस्से का एक इतिहास लिख दिया है। तमिलनाडु के कलपक्कम न्यूक्लियर कॉम्प्लेक्स में दुनिया के वर्तमान शोर से इतर शांत समुद्री किनारे पर भारत के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने कमाल कर दिखाया है, जो आने वाले दशकों में आत्मनिर्भर भारत की किस्मत में एक नई इबारत लिखेगा। 22 सालों के अथक परिश्रम और लंबे इंतजार के बाद प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में एक अहम उपलब्धि हासिल करते हुए क्रिटिकलिटी का चरण सफलतापूर्वक प्राप्त कर लिया है।

रिएक्टर पूरी तरह कार्यशील होने के बाद भारत दुनिया का दूसरा देश बन जाएगा, जिसके पास कमर्शल फास्ट ब्रीडर रिएक्टर होगा। अगले कुछ महीनों तक इसे बेहद कम पावर पर चलाया जाएगा। विशेषज्ञों की निगरानी में अगले कुछ महीने इसकी कार्यक्षमता और सुरक्षा संबंधी पहलुओं की जांच होगी। आशा जताई जा रही है कि यह जल्द ही पूरी तरह से व्यावसायिक रूप से अपनी पूरी क्षमता के साथ बिजली उत्पादन शुरू कर देगा। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था होने के चलते आने वाले सालों में ऊर्जा जरूरतें और बढ़ेंगी ही। ऐसे में भविष्य में यह सस्ती, टिकाऊ और बेहतरीन विश्वसनीय ऊर्जा बेरोक-टोक प्रदान करता रहेगा। पीएम नरेंद्र मोदी ने इसे ऐतिहासिक कदम यूं ही नहीं बताया है। दरअसल, दुनिया में बहुत कम देशों के पास फास्ट ब्रीडर रिएक्टर जैसी जटिल, प्रभावी और उन्नत तकनीक है। ऐसे में इस श्रेणी में शामिल होना न केवल एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि है, बल्कि वैश्विक स्तर पर यह हमारी रणनीतिक और वैज्ञानिक स्थिति को भी मजबूत करता है। भारत के पास थोरियम की सबसे बड़ी खदानें हैं, जो सैकड़ों सालों तक बिजली देती रह सकती हैं।

भारत अभी यूरेनियम और प्लूटोनियम पर आधारित रिएक्टर चला रहा है। पीएफबीआर प्लूटोनियम पैदा करेगा और इसी से आगे चलकर थोरियम को इस्तेमाल करने योग्य ईंधन में बदला जाएगा। पीएफबीआर 'मेड इन इंडिया' का एक जानदार उदाहरण है। एक ऐसा न्यूक्लियर रिएक्टर जो जितना ईंधन इस्तेमाल करता है, उतना ही नया ईंधन तैयार करता है। इसी वजह से इसे 'ब्रीडर' कहा जाता है। इसमें प्लूटोनियम- यूरेनियम के इस्तेमाल से न केवल एनर्जी पैदा होती है, बल्कि भविष्य के लिए अतिरिक्त ईंधन भी तैयार होता है। पुरानी परमाणु राख (वेस्ट) को ही यह नए ईंधन के तौर पर इस्तेमाल कर लेगा। इससे विदेश से महंगा यूरेनियम नहीं खरीदना पड़ेगा। सोचिए, भारत की सदियों की ऊर्जा सुरक्षा के लिए यह कितना बड़ा कदम है! पीएफबीआर के साथ ही भविष्य में थोरियम आधारित रिएक्टर विकसित करने का रास्ता व्यावहारिक रूप से खुल गया है। यह रिएक्टर मौसम पर निर्भर नहीं और कोयले या हाइड्रो से 2-3 गुना सस्ता पड़ेगा। इसका कार्बन एमिशन कोयले की बिजली से कई गुना कम बताया जा रहा है। आने वाले समय में भारत दुनिया का पहला बड़ा थोरियम पावर देश बन सकता है। भविष्य में भारत की बिजली आयात पर निर्भरता घटेगी और वह सस्ती होगी। कोयले या विदेशी यूरेनियम से यह 10 गुना ज्यादा कुशल होगी।

परमाणु कार्यक्रम के अगले चरण तक पहुंचने की चुनौतियां भी कम नहीं हैं। यह लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट है। इसका फायदा आने वाले कई दशकों में मिलेगा इसलिए इन चुनौतियों को सही नीतियों, मजबूत तकनीकी क्षमता और समुचित फंडिग के जरिए जारी रखना जरूरी होगा। जानकार बताते हैं कि फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में सुरक्षा के प्रोटोकॉल सख्त रखने पड़ते हैं, क्योंकि इसमें लिक्विड सोडियम का इस्तेमाल होता है। एक प्रोटोटाइप से आगे बढ़कर कई रिएक्टरों का नेटवर्क तैयार करना भी आसान काम नहीं है। इसके दूसरे चरण में पीएफबीआर जैसे फास्ट ब्रीडर रिएक्टर का कार्यशील होना और तीसरे चरण में थोरियम-232 को यूरेनियम-233 में बदलकर बिजली उत्पादन करना है। कुल मिलाकर, पीएफबीआर मौजूदा (यूरेनियम आधारित) चरण और भविष्य के (थोरियम आधारित) चरण के बीच अहम कड़ी के रूप में सामने आता है। यह पूरा कार्यक्रम भारत के संसाधनों को ध्यान में रखकर बनाया गया है क्योंकि यूरेनियम भले ही सीमित मात्रा में है लेकिन थोरियम के मामले में ऐसा नहीं है। केवल पारंपरिक रिएक्टर इस कमी को पूरा नहीं कर सकते। यहीं पर पीएफबीआर की भूमिका निर्णायक है।

Published on:
21 Apr 2026 02:43 pm
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