जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में एआई और साहित्य के भविष्य पर रोचक चर्चा हुई, जिसमें विशेषज्ञों ने तकनीक के लाभ और सीमाओं पर प्रकाश डाला।
Jaipur Literature Festival जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आयोजित सत्र एआई एंड द फ्यूचर ऑफ बुक्स, रीडिंग एंड नैरेटिव्स में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के साहित्य, प्रकाशन और पढ़ने की आदतों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर गहन चर्चा हुई। सत्र में मेरु गोखले, मार्टिन पुखनर, गुरचरण दास और एम्मा हाउस ने अपने विचार रखे। स्पीकर्स का कहना था कि एआई किताबों और पढ़ने की दुनिया को बदलेगा, लेकिन वह इंसानी कल्पना, संवेदना और अनुभव का स्थान नहीं ले सकता। छपी हुई किताबें न केवल टिकेंगी, बल्कि नए रूप में और अधिक समृद्ध होंगी।
गुरचरण दास ने एआई को एक ऐसे सहायक के रूप में बताया, जो संवाद की सोक्रेटिक पद्धति (सीखने और सोचने की एक तरीका) की तरह सवाल-जवाब के जरिए सोच को आगे बढ़ाता है। उन्होंने कहा कि एआई का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह निष्काम कर्म करता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि एआई में नैतिक जिम्मेदारी नहीं होती, इसलिए इसका विवेकपूर्ण इस्तेमाल जरूरी है।
मार्टिन पुखनर ने कहा कि इतिहास में कागज, प्रिंटिंग प्रेस और अन्य तकनीकी बदलावों ने साहित्य को बदला है। एआई इन सभी बदलावों से कहीं अधिक प्रभावशाली साबित हो सकता है, क्योंकि यह केवल वितरण ही नहीं, बल्कि रचना की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर रहा है। उन्होंने कहा कि अब लेखकों और शोधकर्ताओं के पास हर समय एक तरह का डिजिटल सहायक मौजूद है, जो विचारों को तराशने में मदद करता है।
मेरु गोखले ने प्रकाशन जगत के नजरिए से एआई को एक उपयोगी औजार बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय प्रकाशन उद्योग में लागत एक बड़ी चुनौती है। एआई लेखन और संपादन की लागत घटाकर मदद कर सकता है। इससे प्रकाशक जोखिम लेने में सक्षम होंगे और नई आवाजों को मंच मिलेगा।
एम्मा हाउस ने कहा कि साहित्य और कविता की आत्मा लेखक की मंशा और अनुभव से आती है। एआई तकनीकी रूप से पाठ तैयार कर सकता है, लेकिन उसमें भावनात्मक गहराई और जीवन का अनुभव नहीं होता। इसी वजह से इंसानी लेखन की अहमियत बनी रहेगी।
यह वीडियो भी देखें