जयपुर

आंवला खेती से बदली खवारावजी की तकदीर, युवाओं को मिल रहा रोजगार

Jul 27, 2026
Rajasthan

11 हजार आबादी वाले गांव में 30 फीसदी क्षेत्र में हो रही खेती

पापड़दा. दौसा जिले के पापड़दा क्षेत्र का खवारावजी गांव आज आंवला खेती के कारण नई पहचान बना रहा है। कभी पारंपरिक खेती, बढ़ती लागत और मौसम की मार से जूझने वाले किसानों ने जब फलदार खेती का रास्ता चुना तो उनकी आर्थिक तस्वीर बदलने लगी। आज गांव का आंवला देश की बड़ी कंपनियों तक पहुंच रहा है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर रहा है।
करीब 11 हजार आबादी वाले खवारावजी गांव में लगभग 2 हजार लोग खेती-किसानी से जुड़े हैं। किसानों ने अपनी भूमि का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा आंवला सहित फलदार फसलों के लिए सुरक्षित कर रखा है, जबकि शेष 70 प्रतिशत क्षेत्र में पारंपरिक फसलें उगाई जाती हैं। गांव में वर्तमान में 30 हजार से अधिक आंवला पौधे हैं और हर वर्ष करीब 3 हजार नए पौधे लगाए जा रहे हैं। यहां मुख्य रूप से चकैया किस्म का आंवला लगाया जाता है, जिसका औसत उत्पादन करीब 60 किलो प्रति पेड़ है।
खवारावजी का आंवला अब स्थानीय मंडियों तक सीमित नहीं रहा। किसान और व्यापारी मिलकर इसकी आपूर्ति सीधे बड़ी कंपनियों तक कर रहे हैं। व्यापारी रामकरण सैनी ने बताया कि किसानों से आंवला खरीदकर कंपनियों तक पहुंचाया जाता है। लगातार मांग बढ़ने से कारोबार का विस्तार हुआ है और उनकी कंपनी का सालाना टर्नओवर करीब दो करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। आंवला कच्चे फल के साथ-साथ पाउडर के रूप में भी भेजा जाता है।


गांव में आंवला प्रसंस्करण गतिविधियों ने रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं। आंवला उबालने, सुखाने और चूर्ण बनाने का कार्य स्थानीय स्तर पर किया जाता है, जिसमें महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से बढ़ी है। इससे परिवारों की आय में वृद्धि हुई है और महिलाओं को घर के पास ही रोजगार उपलब्ध हुआ है।



खेती में आए इस बदलाव का असर गांव की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर भी दिखाई देता है। अधिकांश परिवारों के पास अब पक्के मकान और वाहन हैं। बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल रही है और गांव के कई युवा सरकारी नौकरियों में चयनित हुए हैं। बेटियां भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं, जिससे गांव में सकारात्मक बदलाव का माहौल बना है।



आंवला आयुर्वेद में बेहद महत्वपूर्ण फल माना जाता है। विटामिन-सी से भरपूर आंवला च्यवनप्राश, मुरब्बा, अचार, चूर्ण और कई औषधीय उत्पादों में उपयोग किया जाता है। यह कम पानी में अच्छी पैदावार देने वाली बहुवर्षीय फसल है। कृषि विभाग के अनुसार विकसित आंवला बाग से प्रति हेक्टेयर 3 से 6 लाख रुपए तक वार्षिक आय प्राप्त की जा सकती है।



कृषि अधिकारी कमलेश कुमार मीना ने बताया कि आंवला कम पानी में अच्छी आय देने वाली फसल है। विभाग किसानों को फलोद्यान अपनाने के लिए तकनीकी मार्गदर्शन दे रहा है, जिससे उनकी आय और रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं।



फैक्ट फाइल



• कुल आबादी : 11 हजार

• खेती से जुड़े लोग : 2 हजार

• आंवला क्षेत्र : 30 प्रतिशत

• कुल पौधे : 30 हजार से अधिक

• हर साल नए पौधे : 3 हजार

• प्रमुख किस्म : चकैया
• औसत उत्पादन : 60 किलो प्रति पेड़
• कंपनी टर्नओवर : करीब 2 करोड़ रुपए


"आंवला खेती अपनाने के बाद खेती लाभ का सौदा साबित हुई है। अब पहले की तुलना में बेहतर आमदनी हो रही है और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है।"



— **हरिमोहन सैनी, किसान



"आंवला प्रसंस्करण कार्य ने गांव की महिलाओं को घर के पास ही रोजगार उपलब्ध कराया है, जिससे परिवारों की आय बढ़ी है।"



— **विष्णु सैनी, किसान



"किसानों से आंवला खरीदकर सीधे बड़ी कंपनियों तक पहुंचाया जाता है। मांग बढ़ने के साथ कारोबार भी लगातार बढ़ रहा है। वर्तमान में कारोबार का टर्नओवर करीब दो करोड़ रुपए है।"



— **रामकरण सैनी, व्यापारी**


"आंवला कम पानी में अच्छी पैदावार और आय देने वाली बहुवर्षीय फसल है। फलोद्यान विकास से किसानों की आय बढ़ाने के लिए विभाग लगातार तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध करा रहा है।"



— **कमलेश कुमार मीना, कृषि अधिकारी**

Updated on:
27 Jul 2026 06:00 am
Published on:
27 Jul 2026 06:00 am