
ज्यादा पैदावार के लालच में किसान नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटेशियम की भी सही मात्रा का खेतों में उपयोग नहीं कर रहे हं। इससे चारे में फॉस्फोरस की मात्रा भी प्रभावित हो रही है। कमी को पूरा करने के लिए पशु ऐसी अखाद्य वस्तुओं को खाने की इच्छा जाहिर करते है, जिन्हें आहार नहीं कहा जा सकता इसी स्थिति को "पाईका" कहते है।
पाइका रोग के प्रकार
1. पशु द्वारा मिट्टी खाना
2.पशु का गोबर खाना
3. मृत पशुओं की हड्डियां चाटना या चबाना
4 मादा बच्चा देने के बाद स्वयं के नवजात बच्चों को खाना
5. स्वयं या अन्य पशु के बाल या चमड़ी को चाटना
६. मिट्टी तथा दीवार चाटने लगना
७. दूसरे पशुओं का पेशाब पीने का प्रयास
ऐसे होती है रोग की पहचान
- पशुओं के मसूड़ों में सूजन का आना
- भूख न लगना
-वजन में लगातार कमी
-अग्नाशय कमजोर होने से खाना न पचना
-पाचन क्रिया कमजोर होने से मल सूखा या पतला आना
-पशु की हड्डियां कमजोर होना
-प्रजनन क्षमता में कमी
-पशुओं की वृद्धि रुकना।
फॉस्फोरस की कमी का पता लगाएं
-खेत की मिट्टी एवं चारे की जांच करवा कर फॉस्फोरस का पता लगवाएं।
-पशु के खून की जांच करवाएं।
यूं करे उपचार
-पशु चिकित्सक की सलाह पर पशुओं को कम से कम पांच दिन तक फॉस्फोरस का टीका लगवाएं।
-पशुओं को प्रतिदिन 50 ग्राम सोडाफास पाउडर खाने में दें।
- विटामिन "ए" व विटामिन "बी" कॉम्पलेक्स भी दें।
-पेट के कीड़ों की दवा पीलाएं।
-पानी या बांट में सादा नमक पिलाएं।
-खनिज लवणों युक्त चारा खिलाएं।
डॉ. लक्ष्मी नारायण सांखला
सहायक आचार्य, राजुवास, बीकानेर