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सरकार में ‘लैटरल एंट्री’ का प्रयोग सफल क्यों नहीं हो पाया?

वर्तमान अधिकारियों की पदोन्नति के अवसर भी कम हो गए। कुल मिलाकर इन व्यक्तियों के प्रति बहुत सकारात्मक दृष्टिकोण, पूर्व में पदस्थापित अधिकारियों का नहीं रहा और इनकी स्थिति एक प्रकार से अवांछित व्यक्ति जैसी हो गई।
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जयपुर

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Opinion Desk

Aug 01, 2026

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राजेंद्र भाणावत,(पूर्व आइएएस अधिकारी)

लैटरल एंट्री अर्थात सरकार के वरिष्ठ स्तर पर क्षेत्र विशेष के विशेषज्ञों की सीधी भर्ती के लिए भारत सरकार ने पहली बार नियम 2018 में बनाए। इसके माध्यम से उप सचिव, निदेशक एवं संयुक्त सचिव के पदों पर सरकार से बाहर कार्यरत निजी, सार्वजनिक उपक्रमों के विशेषज्ञों की भर्ती का प्रावधान किया गया। यह नियुक्ति संविदा आधार पर 3 वर्ष के लिए की जाती है जिसे 5 वर्ष तक के लिए बढ़ाया जा सकता है। अब तक कुल 63 व्यक्तियों को लैटरल एंट्री के माध्यम से सरकार में नियुक्त किया गया। इनमें से 35 निजी क्षेत्र से संविदा पर तथा शेष 28 सार्वजनिक उपक्रम या किसी राज्य सेवा से प्रतिनियुक्ति पर आए। ये नियुक्तियां उन विभागों में की गईं जहां विशेषज्ञता की आवश्यकता अधिक अनुभव की गई जैसे वित्त मंत्रालय, नागरिक उड्डयन, अक्षय ऊर्जा, परिवहन, कृषि मंत्रालय आदि। बाहर से आए विशेषज्ञों से यह अपेक्षा की गई थी कि वे नवाचार करते हुए त्वरित गति से निर्णय लेंगे। नियमित रूप से चयनित अधिकारी, सालों तक एक ही ढर्रे से काम करने के आदी हो जाते हैं और उनमें जोखिम भरे निर्णय लेने की क्षमता का अभाव हो जाता है।

हालांकि कार्यरत सरकारी अधिकारी अलग-अलग पृष्ठभूमि से आते हैं जिनमें कई इंजीनियर, डॉक्टर, सीए आदि भी होते हैं किंतु उनकी दक्षता समय के साथ-साथ क्षीण हो जाती है और वे अधिकाधिक यथास्थितिवादी बन जाते हैं। निर्णय लेने में लालफीताशाही के कारण समय भी बहुत लगता है। चूंकि इनका स्थानांतरण अलग-अलग विभागों में होता रहता है, ये किसी क्षेत्र की विशेषज्ञता अर्जित नहीं कर पाते। जैसा कि अपेक्षित था, इन व्यक्तियों की स्वीकार्यता पहले से जमे हुए स्थायी अधिकारियों में अधिक नहीं हो पाई और ये सरकारी तंत्र की विभिन्न जटिलताओं से अनभिज्ञ होने के कारण अपना काम भी तत्परता से करने में सफल नहीं हो पाए। एक प्रश्न यह भी था कि संविदा पर लिए गए इन व्यक्तियों की पदोन्नति के कोई अवसर नहीं थे। वर्तमान अधिकारियों की पदोन्नति के अवसर भी कम हो गए। कुल मिलाकर इन व्यक्तियों के प्रति बहुत सकारात्मक दृष्टिकोण, पूर्व में पदस्थापित अधिकारियों का नहीं रहा और इनकी स्थिति एक प्रकार से अवांछित व्यक्ति जैसी हो गई। एक प्रकार से 'कॉग इन द व्हील' बनकर रह गए।

पहली बार लैटरल भर्ती का काम संघ लोक सेवा आयोग को सौंपा गया व साक्षात्कार से चयन किया गया। लैटरल एंट्री के प्रति यह आशंका सदैव जताई जाती रही कि सरकार इसके माध्यम से अपनी पसंद के लोगों को सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर बैठना चाहती है। परस्पर सामंजस्य की कमी और लचीलेपन के अभाव के कारण निजी क्षेत्र से जिन 63 व्यक्तियों ने सरकार में पदभार संभाला, उनमें से 18 व्यक्ति अपना त्यागपत्र दे चुके हैं। इस प्रकार वर्तमान में 43 व्यक्ति ही कार्यरत हैं जो 16 विभागों में पदस्थापित हैं। इस लेटरल एंट्री का विरोध आरक्षण के आधार पर भी हुआ। इस चयन में आरक्षण का प्रावधान नहीं रखा गया। सरकार का तर्क यह था कि यह एक-एक पद के लिए थी, अत: आरक्षण करना कानूनन अनिवार्य नहीं था। इसका कड़ा विरोध सत्ताधारी एनडीए के घटक दलों द्वारा भी किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि 2023 में भर्ती के लिए जो विज्ञापन निकाला गया था, उसे भारी विरोध के कारण निरस्त करना पड़ा। इसके बाद आज तक कोई नई लैटरल एंट्री नहीं हो पाई है।